मध्यकालीन भारत: 1200-1320 ई० (अलाउद्दीन के आर्थिक सुधार, क़ुतुबुद्दीन मुबारक़ ख़िलजी व ख़िलजी वंश का पतन)

मध्यकालीन भारत का इतिहास

खिलजी वंश : 1200 - 1320 ई०

अलाउद्दीन खिलजी के आर्थिक सुधार


अलाउद्दीन खिलजी द्वारा आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार किये गये जिनका सम्बन्ध भू-राजस्व प्रणाली एवं व्यापार-वाणिज्य (बाजार नियंत्रण या मूल्य निर्धारण पद्धति) से था। अलाउद्दीन द्वारा किया गया आर्थिक सुधार राजनीति से सम्बंधित था। वह एक महत्वकांशी शासक तथा सम्पूर्ण भारत पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहता था। इसके लिए उसने सबसे पहले आर्थिक क्षेत्र में सुधार किया। आर्थिक क्षेत्र में सुधार होने से एक विशाल सेना संगठित की जा सकी जिससे भारत के राज्यों पर विजय प्राप्त हुई। इस समय लगान, राज्य की आमदनी का प्रमुख साधन था। इसलिए राज्य के आर्थिक साधनों में वृद्धि के लिए लगान व्यवस्था में सुधार आवश्यक थे।

कर की मात्रा में वृद्धि


अलाउदीन खिलजी का राजस्व सुधार दो उदेश्यों से प्रेरित था:

1. राज्य के लाभ में अत्यधिक वृद्धि, जिससे एक विशाल सेना का गठन किया जा सके।
2. मध्यस्थ भूमिपतियो के विशेषाधिकार को समाप्त करना, क्योंकि ये राज्य को पूरा लगान नहीं देते थे और कृषको का शोषण करते थे।

साथ ही साथ इस वर्ग द्वारा उत्पन्न विद्रोह एवं उपद्रव की समस्या का समाधान हो सके। अलाउद्दीन खिलजी ने भू-राजस्व की दर उपज का 1/3 के स्थान पर 1/2 लगान के रूप में वसूलने का आदेश दिया।

  • खम्स (लूटकर) में भी राज्य के हिस्से में वृद्धि की गयी। [पहले राज्य का हिस्सा 20 प्रतिशत था लेकिन अब 80% जबकि लूटने वाले को पहले 80 प्रतिशत और राज्य को 20 प्रतिशत हिस्सा मिलता था।
  • नये-नये करो (tax) का आरोपण जैसे- घरही (आवासकार), चरही (चाराह्गाह्कर), घोड्ही (घोड़ो पर कर) आदि।
  • अलाउद्दीन ने दोआब क्षेत्र में कर मुक्त भूमि पर केंद्रीय नियंत्रण स्थापित कर दिया और सभी भूमि अनुदान वापस ले लिए।
  • धार्मिक अनुदानों के वापसी का आदेश-इकता, वक्फ, मिल्क, इनाम, इदरार जैसे कर मुक्त अनुदानों को अलाउदीन ने रद्द कर दिया।
  • मध्यस्थ वर्ग (खुत, मुकद्दम, चौधरी) लगान वसूली में राज्य की मदद करते थे और इस सेवा के बदले उन्हें विशेषाधिकार प्राप्त था। जिसे अलाउदीन ने समाप्त कर दिया। क्योंकि ये राज्य को पूरा लगान नहीं देते थे। किसानो का शोषण करते थे तथा अपने विशेषाधिकार का दुरूपयोग एवं विद्रोह को बढावा देते थे। अलाउदीन ने इन्हें लगान वसूली, रियायत, लगान आदि से भी वंचित कर दिया साथ ही साथ इनको घोड़े पर चड़ना, हथियार रखना, महल के वस्त्र पहनना तथा पान खाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।
  • भू-राजस्व के क्षेत्र में सुधार के एक अन्य प्रयास अर्थात, वैज्ञानिक तरीके से भू-राजस्व निर्धारण के लिए कदम उठाना। इसके लिए भूमि के माप को आधार बनाया गया। इसके साथ-साथ राजस्व की वसूली पर भी खिलजी ने विशेष बल दिया। इसके लिए अलग से कर्मचारियों को नियुक्त किया गया तथा बकाया राशि की वसूली के लिए दीवाने मुस्तखराज नामक अधिकारी को नियुक्त किया गया।

अलाउद्दीन के लगान एवं कर संबंधी सुधार पूर्णत: सफल सिद्ध हुए। उसने राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया और साम्राज्य विस्तार के लिए प्रयाप्त साधन उपलब्ध कराये। साथ ही साथ उसने मध्यस्थ वर्ग द्वारा विद्रोह की समस्या पर नियंत्रण भी प्राप्त किया। अत: वह अपने दोनों उदेश्यों को पूरा करने में सफल रहा।

बाजार नियंत्रण या मूल्य निर्धारण पद्धति


अलाउद्दीन के आर्थिक सुधारों में सबसे महत्वपूर्ण सुधार उसकी मूल्य निर्धारण पद्धति या बाजार नियंत्रण था। इसकी जानकारी बरनी की रचना-तारीखे-ए- फिरोजशाही तथा फ़तवा-ए-जहांदारी, अमीर खुसरो की रचना खाजईनुल फुतूह, इसामी की रचना फुतूह-उस-सलातीन तथा इब्नबतूता के यात्रा वृतांत रेहला आदि से होती है।

मूल्य नियंत्रण के उदेश्यों को लेकर आधुनिक एवं समकालीन इतिहासकारों के विचारों में मतभेद है। इतिहासकार बरनी ने इसे सैन्य उदेश्य बताया। अमीर खुसरो ने मूल्य नियंत्रण के कार्य को आम प्रजा की भलाई के लिए बताया। वही कुछ अन्य इतिहासकारों ने साम्राज्यवादी मह्त्वाकांशा से प्रेरित बताया सैन्य कारणों को लेकर ज्यादातर आधुनिक विद्वानों में सहमति है।

बरनी ने अनाज की आपूर्ति से जुड़े निम्नलिखित आदेशो की चर्चा की है जैसे:

  • सभी प्रकार के अनाजो का मूल्य निर्धारित किया गया। जैसे- गेहूँ- 7.5 जीतल प्रति मन, जौ-4 जीतल प्रति मन, चना-5 जीतल प्रति मन, चावल-5 जीतल प्रति मन, शक्कर-3/2 जीतल प्रति मन, गुड-1/3 जीतल प्रति सेर आदि।
  • मंडी या अनाज बाजार में शहना (अधीक्षक) नामक अधिकारी की नियुक्ति।
  • दोआब क्षेत्र में अनाज के माध्यम से लगान वसूली।
  • अनाज को दिल्ली तक ले आने की व्यवस्था।
  • अनाज सस्ता खरीद कर महंगा बेचने के विरुद्ध कठोर दंड की व्यवस्था।
  • लगान वसूली की समुचित व्यवस्था तथा निर्धारित मूल्य पर सरकारी अधिकारियो को अनाज खरीदने की सुविधा।
  • मंडी या अनाज बाजार के दैनिक क्रियाकलाप संबंधी विवरण और गुप्तचरों की नियुक्ति।
  • बाजार नियंत्रण के लिए आवश्यक था कि अनाजो की आपूर्ति बराबर हो और इसके लिए सरकार के पास अनाजो की उपलब्धता का होना आवश्यक था।

इन उदेश्यों को ध्यान में रखकर अलाउदीन ने अनाज की वसूली करने का आदेश जारी किया:

  • किसानो के द्वारा अधिशेष को घर ले जाने पर प्रतिबन्ध लगाया।
  • अनाज को राज्य द्वारा निर्धारित मूल्य पर बेचने के लिए किसानो को बाध्य किया।
  • उपरोक्त कार्यवाही करने से राज्य को निम्न लाभ हुआ
  • बड़े पैमाने पर अनाज का संग्रह संभव हुआ।
  • कालाबाजारी पर नियंत्रण।
  • कीमतों पर नियंत्रण इत्यादि।

बाजार नियंत्रण नीति की सफलता के लिए न केवल अनाजो की वसूली बल्कि उसके भंडारण तथा उचित तरीके के वितरण के लिए एक व्यवस्थित तंत्र का होना आवश्यक था। अत: अलाउद्दीन खिलजी ने इस दिशा में भी प्रयास किया। जैसे-
अनाज संघ्रहण के लिए जगह-जगह खाध संग्रहालय का निर्माण करवाया।

  • अनाज को एक स्थान से दुसरे स्थान तक के जाने के लिए व्यापारियों को बाध्य किया गया। इन व्यापारियों को बाजार के अधीक्षक के पास अपना नाम दर्ज कराना होता था। तथा नियमित अनाज आपूर्ति के लिए वचन भी देना होता था।
  • अनाजो को नियमित वितरण के लिए केंद्रीय बाजारों की स्थापना की गयी। जहां से अलग-अलग क्षेत्रो में स्थापित दुकानों को अनाज की आपूर्ति की जाती थी।
  • अलाउद्दीन खिलजी अपने गुप्तचरों एवं निजी सेवको के द्वारा बाजार की गतिविधियों पर नजर रखता था तथा अनियमितता पाए जाने पर कठोर से कठोर दंड देता था।

अलाउद्दीन ने वस्त्रो की कीमतों का भी निर्धारण किया। यहाँ तक कि कीमतों में वृद्धि न हो सके, इसके लिए राज्य के द्वारा व्यापारियों को ब्याज उपलब्ध कराया गया। व्यापारियों को उनकी सेवा के बदले कमीशन दिया जाता था। कीमती वस्त्रो को विशेष परमिट के आधार पर ही ख़रीदा जा सकता था।

दासो, घोड़ो एवं मवेशियों के बाजार में मूल्य वृद्धि का एक महत्वपूर्ण कारण दलालों की उपस्थिति होती थी, जो व्यापारियों एवं ग्राहकों दोनों से कमीशन वसूलते थे। अलाउद्दीन ने इन दलालों को बाजार से निष्कासित किया और इनसे सम्बंधित कुछ नियम बनाये गये। प्रत्येक व्यापारी को अपने पशुओ को सरकारी अधिकारी के समक्ष निरिक्षण करवाना होता था। इसके आधार पर ही पशुओ की श्रेणिया निर्धारित होती थी तथा निर्धारित मूल्य पर ही व्यापारियो को बेचना होता था। विभिन्न अधिकारी वर्ग ने उपरोक्त प्रक्रिया को सहयोग प्रदान किया।

बाजार नियंत्रण एवं सुधार के साथ-साथ उसने भू-राजस्व के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। अलाउद्दीन दिल्ली सल्तनत का प्रथम शासक था जिसने भू-राजस्व के निर्धारण के लिए ज़मीन की माप (पैमईश) को आधार माना तथा मध्यस्थवर्ग (ख़ूत और मुक्कद्दम) को भी भू-राजस्व देने को कहा, जिस तरह आम जनता देती थी।

क़ुतुबुद्दीन मुबारक़ ख़िलजी (1316-1320 ई०) और ख़िलजी वंश का पतन


अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन के अंतिम समय में बड़े पुत्र खिज खां को उत्तराधिकारी से वंचित कर दिया और अपने सबसे छोटे अल्पवयस्क पुत्र (पांच या छ: वर्ष) शहाबुद्दीन उमर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। किन्तु अलाउद्दीन के अंतिम दिनों में मलिक काफूर के प्रभाव और शक्ति में वृद्धि हुई। उसने अलाउद्दीन की मृत्यु के पश्चात अल्पवयस्क को सिंहासन से अपदस्थ करके स्वयं को उसका संरक्षण घोषित कर लिया तथा उसने शहाबुद्दीन की माँ से विवाह कर लिया जो देवगिरी के शासक रामचंद्र देव कि पुत्री थी। अलाउद्दीन अन्य पुत्रो को बंदी बना लिया गया। मालिक काफूर के व्यव्हार और शक्ति के दुरूपयोग करने से अधिकांश सामंत उसके विरुद्ध हो गये तथा उन्ही सामन्तो में कुछ मुबारक को समर्थन दे रहे थे। अतत: मलिक काफूर को 35 दिन तक सत्ता संचालन के बाद मार डाला गया और 19 अप्रैल, 1316 ई० को कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी को दिल्ली का सुल्तान बनाया गया।

कुतुबुद्दीन मुबारक ने उदार शासन की नीति अपनायी। अलाउद्दीन और मलिक काफूर द्वारा बंदी बनाये गये व्यक्तियों को उसने मुक्त कर दिया, सैनिको का वेतन बड़ा दिया, लोगो की जब्त की गयी भूमि वापस कर दी तथा उलेमा वर्ग को आर्थिक अनुदान पुन: देना आरम्भ किया और वे सभी आदेश वापस ले लिए गये, जो जनता के लिए अप्रिय थे। उसने राज्य में शान्ति और सुशासन व्यवस्था बनाये रखने के लिए कई कदम उठाये। सर्वप्रथम उसने गुजरात विद्रोह को शांत किया और शासन व्यवस्था को मजबूत किया। उसने स्वयं देवगिरी पर चढाई (1318 ई०) की और वहां का शासक हरपाल देव को पराजित किया तथा देवगिरी पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित किया एवं एनल मुल्क मुल्तानी को वहां का शासक नियुक्त किया।

मुबारक ने वारंगल के शासक प्रताप रूद्र देव के क्षेत्र पर आक्रमण तथा खुसरो खां को माबर (मदुरा) के क्षेत्र पर आक्रमण का आदेश दिया। इस प्रकार दक्षिण भारत में सल्तनत की शक्ति का सफल प्रदर्शन किया गया परन्तु इसके विरुद्ध अनेक षड्यंत्र किये गये जिससे वह सभी पर शक करने लगा। वह शासन के प्रति उदासीन और क्रूर व्यवहार करने लगा। वह सुल्तान की प्रतिष्ठा के प्रतिकूल भोग-विलास में लिप्त हो गया और इन्हीं परिस्थितियों में खुसरो खां द्वारा मुबारक की हत्या कर दी गई। वह दिल्ली सल्तनत पर स्वयं शासन करने लगा और नासिरुद्दीन खुसरो शाह की पदवी धारण की।

सीमान्त क्षेत्र के शक्तिशाली शासक गाजी तुगलक ने खुसरो का विरोध किया तथा अन्य प्रांतीय अधिकारियो से सहायता मांगी। उसके द्वारा खुसरो खां पर इस्लाम-विरोधी आचरण, अलाउद्दीन के वंश के प्रति विश्वासघात और अन्य अपराधो को दोष आरोपित किया गया। गाजी तुगलक ने दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण किया और खुसरो खां को पराजित कर सत्ता पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।

इस प्रकार विभिन्न परिस्थितियों और व्यक्तियों ने खिलजी वंश के पतन में भाग लिया, खासकर मुबारक खिलजी ने। खिलजी शासको ने रक्तपात के माध्यम से दिल्ली के सिंहासन को प्राप्त किया था और अंत में रक्तपात के माध्यम से ही उनके वंश का पतन हो गया।


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