प्रारंभिक परीक्षा : सामान्य अध्ययन (पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी) - बायोम, पारिस्थितिकी संरचना एवं क्रियाशीलता

सामान्य विज्ञान (General Science)

पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी (Environment and Ecology)

पर्यावरण, बायोम, पारिस्थितिकी संरचना

 

परि + आवरण

  • हमारे चारों ओर का वातावरण
  • हम और हमारे चारों तरफ के वातावरण को पर्यावरण कहते है।
  • जैविक और अजैविक घटकों से निर्मित वातावरण को पर्यावरण कहते है।
  • जैविक और अजैविक घटकों से निर्मित वातावरण जिसका मानव एक महत्वपूर्ण घटक होता है।

पर्यावरण के प्रकार

1. प्राकृतिक पर्यावरण - मानव हस्तक्षेप रहित - जैसे कि, अण्डमान निकोबार के जंगल।
2. आर्थिक पर्यावरण - इसमें मानव की आर्थिक क्रियाओ का अध्ययन किया जाता है। प्राकृतिक पर्यावरण को ही संशोधित कर दिया जाता है, आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।
3. सामाजिक पर्यावरण - सामाजिक अन्तर्संबंधो व अंतक्रिया का अध्ययन किया जाता है। i.e., मानव के साथ अन्य जीवों की जन्तुओ की भी सामाजिक संरचन और संगठन होती है।
4. संस्कृति पर्यावरण - मानव के द्वारा संशोधित प्राकृतिक पर्यावरण को सांस्कृतिक पर्यावरण कहते है। प्राकृतिक + आर्थिक + सामाजिक = सांस्कृतिक पर्यावरण।

आवास के आधार पर बायोम के दो प्रकार

1). स्थलीय बायोम   
  • वन
  • सवाना
  • घास के मैदान
  • मरुस्थलीय बायोम
  • टुंड्रा
  • टैगा बायोम - साइबेरियन प्रदेश के शंकुधारी
 2). सागरीय बायोम

बायोम के समुह को जैवमण्डल कहते है जो एक वृहत और जटिल परिसिथतिक तंत्र होता है जिसकी क्रियाशीलता का अध्ययन अत्यन्त कठिन होता है इसलिये इसकी सूक्ष्मतम इकाई की कल्पना पारिस्थिकी तंत्र के रूप में की जाती है।

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पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना, संगठन एवं क्रियाशीलता


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किसी भी पारिसिथतिकी तंत्र की क्रियाशीलता का संबंध तंत्र की उत्पादकत से है। उत्पादक स्तर पर हरे वनस्पति प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के द्वारा सौर ऊर्जा के जिस अनुपात को जैवरासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित कर कार्बनिक पदार्थो के रूप में संचित करते है उसे सकल प्राथमिक उत्पादकता कहते है। हरे वनस्पति के द्वारा भी श्वसन की क्रिया के लिए ऊर्जा का उपयोग किया जाता है इसलिये सकल प्राथमिक उत्पादकता में से श्वसन की क्रिया के लिए उपयोग की गई ऊर्जा के बाद जो शेष ऊर्जा प्राथमिक उपभोक्ता या शाकाहारियों को प्राप्त होते है उसे शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता कहते है। प्राथमिक उपभोक्ता के स्तर पर उपयोग की गई ऊर्जा के बाद जो ऊर्जा दितीयक उपभोक्ता अर्थात मासाहारियो को उपलब्ध होते है उसे दितीयक उत्पादकता कहते है।

इस प्रकार प्रत्येक पोषण स्तर (Tropic Level ) पर कार्बनिक पदार्थो के रूप में संचय होने के साथ उपयोग भी होता है। जिसके कारण प्रथम पोषण स्तर से उच्च पोषण स्तर की ओर जाने पर ऊर्जा की उपलब्धता में कमी आती है। इसलिये ही मासाहारियो को सबसे काम ऊर्जा की प्राप्ति होती है। जबकि उनकी शरीरिक संरचना जटिल होने के कारण उनकी क्रियाशीलता अधिक होती है। मानव समुदाय ने अधिक ऊर्जा की प्राप्ति के लिए परिसिथतियों नियम का उललंघन कर Food Habit (आहार की आदत) में बदलाव कर मांसाहारी से सर्वाहारी हुए।

1. भूजैवरासायनिक चक्र (Geo biochemical Cycle)
2. भूजैव आवद्रन (Geo biomagnification)
3. भूजैव संचयन (Geo Bioaccumulation)

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