प्रारंभिक परीक्षा : सामान्य अध्ययन (प्राचीन भारतीय इतिहास) - सिन्धु घाटी की सभ्यता - भाग - 2

प्राचीन भारतीय इतिहास: सिन्धु घाटी की सभ्यता (Indus Valley Civilization)

सैन्धव स्थलों से प्राप्त वस्तुएँ एवं अवशेष (Items and Residues Found at Harappan Sites)


  वस्तुएँ       स्थल
1. वृहत स्नानागार, अन्नागार, मातृदेवी की मूर्ति, काँसे की नर्तकी की मूर्ति, राज मुद्रांक, तीन मुख वाले पुरुष की ध्यान मुद्रा वाली मुहर मोहनजोदड़ो
2. ताबुतो के शवाधान के साक्ष्य, कब्रिस्तान आर -37 , शंख का बना बैल, पीतल की इक्का गाड़ी, मजदूरों के आवास, कागज का साक्ष्य हड़प्पा
3. आयताकार 7 अगिन वेदिकाएँ, जूते खेत के साक्ष्य, काँच की मिटटी की चूड़ियाँ, सिलबट्टा, सूती कपड़ें की छाप, मनके इत्यादि कालीबंगा
4. गोदीवाड़ा, खिलौना नाव, मिटटी के बर्तन पर चालाक लोमड़ी का चित्रण, धान की भूसी, मनका उधोग के साक्ष्य लोथल
5. वक्राकार ईटे, कंधा, रंजनश्लाका (लिपस्टिक), चार पहियों वाली गाड़ी, ईटो पर बिल्ली का पीछा करते कुत्ते के निशान, अलंकृत हाथी इत्यादि चन्हुदडो
6. खिलौने वाले हल, जौ, ताँबे के बाणाग्र बनावली

http://www.iasplanner.com/civilservices/images/ancient-history.pngसैन्धवकालीन प्रौधोगिकी, कला एवं शिल्प (Harappan Technology, Art and Sculpture)


सैन्धव निवासी व्यापार तथा कृषि के अलावा प्रौधोगिकी, शिल्प और कला के भी उन्नत जानकार थे। खुदाई से मिले उधोगो के साक्ष्य तथा शिल्प एवं कला के अवशेष उनकी रूचि तथा जानकारी को प्रदर्शित करते है। सैन्धवकालीन धातु उधोग उन्नत अवस्था में था। वे लोहे से परिचित नहीं थे, लेकिन ताँबा तथा टिन मिलकर काँसा बनाना जानते थे, जिसका प्रमाण है द्रवीमोम विधि से निर्मित काँसा की नर्तकी की मूर्ति , जो उनके धातु एवं रसायन विज्ञानं के ज्ञान को स्पष्ट करती है। सोना, चाँदी, ताँबा तथा काँसा का उन्हें ज्ञान था और इन धातुओं का प्रयोग वो आभूषण बनाने में करते थे तथा ताँबे-काँसे से उपकरण भी बनाना जानते थे। धातुओं को गलाने, पीटने तथा उन धातुओं पर पानी चढ़ाने की तकनीक से सैन्धववासी अच्छी तरह परिचित थे। शंख, शीशा, हाथी दाँत तथा घोंघा से भी उपकरणो का निर्माण होता था।

उत्खनन से प्राप्त कताई, बुनाई यथा - तकली, सुई आदि उपकरणो से पता चलता है कि वस्त्र उधोग था। ऊनी तथा सूती वस्त्र दोनों के साक्ष्य मिले है। मोहनजोदड़ो से जो पुरोहित की मूर्ति मिली है, उसके वस्त्र अलंकृत है, जिससे ज्ञात होता है कि सैन्धव बुनकर वस्त्रो पर कढ़ाई करने का भी ज्ञान रखते थे। वस्त्रों की रंगाई का काम भी होता था। इसके अलावा चाक पर मिटटी के बने बर्तन, खिलौने, मुद्राओ आदि का निर्माण होता था। मोहनजोदड़ो से मिले ईट के भटठे के साक्ष्य तथा सैन्धव नगरों में पकी ईटो का बड़े पैमाने पर प्रयोग से यह ज्ञात होता है कि ईट उघोग विकसित था।

सभ्यता का पतन ( Decline of Civilization)


इस सभ्यता के प्राचीन अवशेषों के अध्ययन से यह पता चलता है कि अपने अन्तिम चरण में यह सभ्यता पतनोन्मुख रही। अन्ततः द्रितीय सहस्त्राब्दी ई०पू० के मध्य इस सभ्यता का पूर्णत: विनाश हो गया। इस सभ्यता के विनाश के बारे विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने मत प्रस्तुत किये है

विभिन्न विद्वानों द्वारा सैन्धव सभ्यता के पतन संबंधी मत (Opinion of Various Scholars Regarding Fall of Harappan Civilization)


  • आर्यों का आक्रमण - गार्डन चाइल्स एवं व्हीलर
  • पारिस्थितिकी असंतुलन - फेयर सर्विस
  • नदी मार्ग में परिवर्तन - एम. एस. वत्स
  • बाढ़ - मैके. एस. आर. राव
  • घग्घर का सूख जाना - डी. पी. अग्रवाल
  • भूकंप एवं जल प्लावन - राइक्स एवं डेक्स
  • वर्षा में कमी – आस्टाईन

हड़प्पा सभ्यता की उत्तरजीविता और निरन्तरता(Survival and Continuity of Harrapan Civilization)


नगरीय सभ्यता के उतकर्ष होने के कारणों के कमजोर होने से सभ्यता का पतन निश्चित रूप से हो जाता है, परन्तु उस सभ्यता की सामाजिक व सांस्कृतिक उच्चताओं का अवसान नहीं होता, बल्कि वे नागरिको के पलायन के साथ और विस्तृत होती जाती है। आज भी धर्म संबंधी अनेक विशेषताएँ, यथा -जल पूजा, वृक्ष पूजा, शिव तथा शक्ति की पूजा, सूर्य पूजा आदि हमारे दैनिक जीवन में सम्मिलित है जो सैन्धव सभ्यता की ही देन है। अतः सभ्यता की समाप्ति के बाद भी उसकी सांस्कृतिक उच्चताएं निरंतर आने वाली सभ्यताओं में परिलक्षित होती है। व्यापार, परिवहन, नियोजित नगरीय व्यवस्था तथा शिल्प एवं तकनीक की अनेक विधियाँ जो हड़प्पावासियों की देन थी, आज भी प्रचलित है।

ताम्रपाषाण - कालीन संस्कृतियाँ (Chalcolithic Cultures)


दूसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व तक भारतीय उपमहादीप के विभिन्न भागों में विभिन्न क्षेत्रीय संस्कृतियों का उदय हुआ। ये संस्कृतियों न तो शहरी और न ही हड़प्पा संस्कृति की भाँति थी, बल्कि पत्थर एवं ताँबे के औजारों का इस्तेमाल इसकी अपनी विशिष्टता थी। अतः ये संस्कृतियाँ ताम्रपाषाण संस्कृति के नाम से जानी जाती है। तकनीकी दृष्टि से ताम्रपाषाण अवस्था हड़प्पा की कांस्य संस्कृति पहले आती है और अधिकांश ताम्रपाषाण-कालीन संस्कृतियाँ बाद में।

  • अहार संस्कृति -    2100-1500 ई० पू०
  • कायथा संस्कृति – 2000-1800 ई० पू०
  • मालवा संस्कृति – 1700-1200 ई० पू०
  • जोर्वे संस्कृति – 1400-700 ई० पू०
  • गौरिक मृदभाण्ड संस्कृति – 2000-1500 ई० पू०
  • सवालदा संस्कृति – 2000-1800 ई० पू०
  • चिरंदा संस्कृति – 1500-750 ई० पू०


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