प्रारंभिक परीक्षा : सामान्य अध्ययन (प्राचीन भारतीय इतिहास) वैदिक काल - भाग - २

प्राचीन भारतीय इतिहास: वैदिक काल (Vedic Age)


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उत्तर - वैदिक काल (Post-Vedic Age : 1000 – 600 BC)

उत्तर - वैदिक काल की जानकारी के पुरातात्विक एवं साहित्यिक स्रोत ऋग्वैदिक काल की तुलना में कम समस्याग्रस्त है। सामान्यतः लौह प्रौधोगिकी की शुरुआत को उत्तर-वैदिक काल से जोड़ा जाता है, जिसके कि पुरातात्विक साक्ष्य भी उपलब्ध है।

पुरातात्विक स्रोत (Archeological Sources)


उत्तर-वैदिक काल के अध्ययन के लिए चित्रित घूसर मृदभांड और उत्तरी काले पॉलिशदार मृदभांड महत्वपूर्ण साक्ष्य आर्यों के भौगोलिक विस्तार और उनके जीवन के विभिन्न पक्षों की जानकारी देते है। अभी तक चित्रित घूसर मृदभांड से जुड़े 750 स्थल पता लग पाए है जिनमें से अभी केवल 30 की ही खुदाई संभव हो सकी है।

उत्तर- वैदिक काल में लोहे का प्रयोग किया जाने लगा था। अभी तक उत्खनन में लौहे-उपकरणों की सर्वाधिक संख्या अतिरंजीखेड़ा (एटा, उत्तर प्रदेश) से प्राप्त हुई है। वैदिक काल के अंतिम दौर में लोहे का ज्ञान पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं विदेह तक फैल गया था। यजुर्वेद में इन धातु-उपकरणों को 'श्याम अयस' अथवा 'कृष्ण अयस' की संज्ञा दी गई है।

साहित्यिक स्रोत (Literary Sources)


उत्तर-वैदिक काल के अध्ययन हेतु महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोतों में यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राहाण ग्रंथ, उपनिषद एवं आरण्यक प्रमुख है। इन साहित्यिक स्रोतों के अनेक भागों को निम्नलिखित रूप से वर्गीकृत किया जा सकता है-

वैदिक साहित्य के स्रोत (Sources of Vedic Literature)


वेद

ब्राहाण

उपनिषद

आरण्यक

सूक्त

अध्येता

उपवेद

ऋग्वेद

ऐतरेय

ऐतरेय

ऐतरेय

1028

होतृ

आयुर्वेद

कौषितकी

कौषितकी

कौषितकी

यजुर्वेद

तैत्तिरीय, शतपथ

तैत्तिरीय कंठ,

तैत्तिरीय

-

अध्वर्यु

धनुर्वेद

श्वेताश्वर,

वृहदारण्यक

ईश, वृहदारण्यक

शतपथ

सामवेद

पंचविश (इसे ताण्ड्य ब्राह्मण भी कहते है)

छानदोग्य

जैमनीय

1810 मंत्र

उद्गाता

गंधर्व वेद

केन

छानदोग्य

(नारद कृत)

अथर्ववेद

गोपथ

प्रश्न

मुंडन

माण्डूक्य

-

6000 मंत्र (लगभग)

ब्रह्मा

शिल्पवेद (विश्वकर्मा द्वारा रचित)

सामाजिक व्यवस्था (Social System)


उत्तर-वैदिक काल में जाति-पाँति के भेदों का विकास होने लगा था। इसके मूल में विभिन्न व्यवसायों की संख्या में वृद्धि सहित अनेकरूपता पाई जाती है, जो कि प्रायः व्यवस्थित जीवन के साथ देखी जाती है। यह निश्चय ही आदिवासियों के साथ संपर्क का आवश्यक परिणाम था, परंतु इसके साथ रक्तशुद्धि और वर्ण-विभेद संबंधी अनेक जटिल प्रश्न उठ खड़े हुए।

इस काल में याज्ञिक अनुष्ठानों में वृद्धि होने से ब्राह्मणो (Brahmanas) और क्षत्रियों (kshatriyas) के बीच परस्पर सहयोग बना रहना चाहिए। इससे समाज के शेष वर्गों पर उनका प्रभुत्व बना रहेगा। वैश्यों को उत्पादन- संबंधी कार्य, कृषि और पशुपालन सौंपे गए थे। ऋग्वैदिक साहित्यिक स्रोतों से संकेत मिलता है कि उत्तर-वैदिक काल में केवल वैश्य (Vaishyas) ही राजस्व चुकाते थे। ऊपर के तीन वर्णों की सामान्य विशेषता यह थी कि वे उपनयन संस्कार (Ceremony of Investiture with the Sacred Thread) के अधिकारी थे, जबकि चौथे वर्ग अर्थात शूद्र (Shudra) को उपनयन का अधिकार नहीं था। यहीं से शुद्रो को अपात्र या अधिकारहीन मानने की प्रक्रिया आरंभ हो गयी। सामान्यता: उत्तर-वैदिककालीन ग्रंथो में तीन उच्च वर्णों और शूद्रों के बीच विभाजन रेखा (Dividing Line) देखने को मिलती है। तथापि, राज्याभिषेक (Coronation) से जुड़े ऐसे कई सार्वजनिक अनुष्ठान होते थे, जिनमें शूद्र संभवतः मूल आर्य प्रांतीय कबीलों के बचे हुए सदस्यों की हैसियत से भाग लेते थे। शिल्पियों में रथकार आदि जैसे कुछ वर्गों का स्थान ऊँचा था और इन्हें यज्ञोपवीत (Scared Thread) पहनने का अधिकार प्राप्त था। इस प्रकार हम देखते है कि इस काल में भी वर्ण-भेद (Caste Distinction) अधिक प्रखर नहीं हुआ था।

उत्तर-वैदिक काल में गोत्र-प्रथा (Clan System) स्थापित हुई और आश्रम-व्यवस्था (Ashram System) सुप्रतिष्ठित हुई। इस काल में संस्कार (Ceremonials) भी प्रतिष्ठित हुए। वैदिकोत्तर काल के ग्रंथो में चार आश्रमों - ब्रहाचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास का उल्लेख स्पष्ट रूप से हुआ है। उत्तर-वैदिक काल के ग्रंथो में केवल तीन आश्रमों का उल्लेख है। चतुर्थ या अंतिम आश्रम उत्तर-वैदिक काल में सुप्रतिष्ठित नहीं हुआ था। वैदिक काल में भी गृहस्थ आश्रम सभी वर्णो (Castes) में सामान्यत: प्रचलित था। उत्तर-वैदिक काल की सामाजिक व्यवस्था को संक्षेप में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-

  • इस काल में समाज का स्पष्ट विभाजन चार वर्णो - ब्राह्मण, क्षत्रियों (राजन्य), वैश्य और शूद्र में हो गया।
  • इस काल में यज्ञ (Yajan) का महत्व अत्याधिक बढ़ गया, जिससे ब्राह्मणो की शक्ति में अपार वृद्धि हुई।
  • इस कल में वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म- आधारित (Profession - Based) न होकर जन्म-आधारित (birth - based) हो गया तथा वर्णो में कठोरता आने लगी।
  • समाज में अनेक धार्मिक श्रेणियों (Religious Categories) का उदय हुआ, जो कि कठोर होकर विभिन्न जातियों (Caste) में बदलने लगी। अब व्यवसाय आनुवांशिक (Patrimonial) होने लगे।
  • इस काल में समाज में अस्पृश्यता (Untouchability) की भावना का उदय नहीं हुआ था।
  • इस काल में स्त्रियो का पैतृक संपत्ति (Ancestral Property) से अधिकार छीन गया और सभाओ में प्रवेश वर्जित हो गया।

आर्थिक व्यवस्था (Economic System)


उत्तर-वैदिक काल में आरंभिक आर्यों के पूर्वी भौगोलिक विस्तार के साथ उनकी अर्थव्यवस्था में भी परिवर्तन आया। अब पशुचारण (Herding) के स्थान पर कृषि (Agriculture) अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बन गई, जिसका प्रमाण उत्तर-वैदिककालीन ग्रंथो में कृषि-संबंधी कार्यो के लिए प्रयुक्त कई शब्दों से मिलता है। इसके अतिरिक्त, उत्तर- वैदिककालीन ग्रंथ 'शतपथ ब्राहाण' में कृषि- संबंधी कर्मकाण्डों एवं अनुष्ठानों का वर्णन है। इस ग्रंथ में 'विदेह माधव' की कथा का उल्लेख है, जिससे संकेत मिलता है कि आर्य संपूर्ण गंगा की घाटी में कृषि कार्य करने लगे थे।

इस काल में कृषि में विस्तार, शिल्पों में कुशलता, व्यापार एवं वाणिज्य के आरंभ होने के परिणामस्वरूप जनसंख्या में वृद्धि हुई उसका विस्तार हुआ। इस प्रकार, कुल मिलाकर उत्तर -वैदिक काल लोगो के जीवन में अभूतपूर्व प्रगति हुई। अब अर्थव्यवस्था का स्वरूप अधिक विविध और व्यापक हो गया। हालाँकि कृषक अभी भी उतना अधिक उत्पादन नहीं कर पाते थे जिससे नियमित व्यापार, वाणिज्य, नियमित कर-व्यवस्था, स्थायी सेना या फिर नगरों का उदय हो सके, फिर भी उन्होंने स्थायी जीवन और प्रादेशिक राज्यों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया नगरीकरण के इस चरण को आघ-नगरीकरण (Semi - Urbanisation) का काल कहा जाता है। इस काल के आर्थिक व्यवस्था के कुछ प्रमुख तथ्य इस प्रकार प्रस्तुत किए जा सकते है:

  • इस काल में आर्यों का मुख्य व्यवसाय कृषि (Agriculture) था। शतपथ ब्राहाण में कृषि की चारों महत्वपूर्ण क्रियाओं- जुताई, बुआई, कटाई तथा मढ़ाई का उल्लेख आया है।
  • भूमि पर व्यक्तिगत अधिकार (Private Possession) की भावना धीरे-धीरे प्रबल होती जा रही थी।
  • इस काल के लोग चार प्रकार के बर्तनों (मृदभांडों) से परिचित थे - काले व लाल मृदभांड, काले रंग के मृदभांड, चित्रित घूसर मृदभांड और लाल मृदभांड।
  • ब्राहाण ग्रंथो में 'श्रेष्ठिन' का भी उल्लेख मिलता है। 'श्रेष्ठिन' श्रेणी का प्रधान व्यापारी (Cheif Merchant) होता था।
  • निष्क, शतमान,पाद, कृष्णल, रतिका तथा गुंजा आदि माप (Measurement) की भिन्न-भिन्न इकाइयां थी। निष्क, जो ऋग्वैदिक काल में एक आभूषण था, अब मुद्रा (Currency) माना जाने लगा।
  • व्यापार प्रापण (Procurement) द्वारा सम्पन्न होता था, जिसमे लेन-देन का माध्यम गाय (Cow) एवं निष्क (Nishk) को माना जाता था।

उत्तर-वैदिककालीन प्रमुख यज्ञ


राजसूय यज्ञ : यह यज्ञ राजा के राज्याभिषेक हेतु होता था। इस अनुष्ठान यज्ञ से प्रजा को यह विश्वास हो जाता था कि उसके सम्राट को दिव्य शक्ति (Divine Power) मिल गई है। इसमें 'सोमरस' नामक मादक पदार्थ पीया जाता था तथा राजा रत्नियो (Ratnis) के घर जाता था।

अश्वमेघ यज्ञ : इस यज्ञ में राजा द्वारा छोड़ा गया घोड़ा (Horse) जिन-जिन क्षेत्रों से बिना प्रतिरोध के गुजरता था,उन सभी क्षेत्रों पर राजा का एकछत्र राज्य (Asolute Control) स्थापित हो जाता था अर्थात यह यज्ञ शक्ति प्रदर्शन का घोतक था। यह राजकीय यज्ञों में सर्वाधिक प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण होता था।

वाजपेय यज्ञ : इस यज्ञ में राजा रंथो (Chariots) की दौड़ का आयोजन करता था, जिसमे राजा को सहयोगियों द्वारा विजयी बनाया जाता था। यह यज्ञ विशेषत: खाने-पीने से जुड़ा होता था।

अग्निष्टोम यज्ञ : इस यज्ञ में भी 'सोमरस' पीया जाता था तथा अग्नि को पशुबलि (Animal Sacrifice) दी जाती थी। इस यज्ञ से पूर्व याज्ञिक व उसकी पत्नी को एक वर्ष तक सात्विक जीवन व्यतीत करना होता था।

ऐतरेय ब्राहाण में उल्लिखित शासन - प्रणालियाँ


पूर्व

साम्राज्य

सम्राट

पश्चिम

स्वराज्य

स्वराट

उत्तर

वैराज्य

विराट

दक्षिण

भोज्य

भोज

मध्यदेश

राज्य

राजा

राजनीतिक व्यवस्था (Political System)


उत्तर-वैदिक काल में सभा, समिति आदि प्रतिनिधिध्यात्मक संस्थाओं (Representative Institutions) का प्रभाव क्षीण होने लगा। विदथ (Vidath) का नामोनिशान नहीं रहा, जबकि सभा (Sabha) और समिति (Samiti) अपनी जगह बनी रही, परंतु उनका स्वरूप बदल गया। अब उनमें समाज के प्रभावशाली वर्ग का वर्चस्व हो गया। अब सभा में स्त्रियो का प्रवेश वर्जित हो गया।

उत्तर-वैदिक ग्रंथो में संकेत मिलता है कि राजा का निर्वाचन (Election) होता था। वह अपने सामान्य कुलजनों या प्रजाजनों में से जो विश (vish) कहलाते थे, से बलि (Gift) अर्थात स्वेच्छा से दी गई भेंट प्राप्त करता था। कालांतर में राजा ने भेंट-प्राप्ति के इस अधिकार को और अपने पद की अन्य सुविधाओं को हमेशा कायम रखने के उदेश्य से राजा के पद को आनुवांशिक (Patrimonial) बना लिया। इस प्रकार राजा का पद सामान्यतः ज्येष्ठ पुत्र (Eldest Son) को मिलने लगा, लेकिन उत्तराधिकारी का यह क्रम निर्विध्न (Uninterrupted) रूप से नहीं चला। कर्मकांडीय विधानों ने राजा को और भी प्रभावशाली बना दिया। इस काल में राजा राजसूय, अश्वमेघ, अग्निष्टोम, वाजपेय यज्ञ जैसे धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन करता था। इन सारे अनुष्ठानों से प्रजा (People) के चित पर राजा की बढ़ती हुई शक्ति और महिमा की गहरी छाप पड़ती थी।

धर्म (Religion)


उत्तर-वैदिक काल में गंगा-यमुना दोआब आर्य-संस्कृति का केंद्रस्थल बन गया। ऐसा अनुमान है कि सारा उत्तर-वैदिक साहित्य कुरु - पांचालो के दूसरे प्रदेशो में विकसित हुआ। इस संस्कृति का मूल धार्मिक अनुष्ठान था। वैसे यज्ञ के आलावा भी कई अनुष्ठान और मंत्र विधियाँ प्रचलन में आई।

ऋग्वैदिक काल के दो सबसे बड़े देवता (God) इंद्र और अग्नि अब उतने प्रमुख नहीं रहे। इनकी जगह उत्तर-वैदिक देव मंडल में सृजन के देवता 'प्रजापति' को सर्वोच्च स्थान मिला। ऋग्वैदिक काल के कुछ अन्य गौण देवता भी प्रमुख हो गए। इसके अलावा, देवताओ के प्रतिक के रूप में कुछ वस्तुओं की भी पूजा प्रचलित हुई। इस काल में मूर्ति-पूजा (Idol Worship) का कुछ आभास मिलता है। चूँकि, वर्ण - व्यवस्था (Caste System) अपेकक्षाकृत कठोर हो गई थी, अतः कुछ वर्णो (Caste) के अपने अलग देवता हो गए।

देवताओं की आराधना (Gods , Worship) के जो भौतिक उदेश्य पूर्व काल में थे, वे इस काल में भी बने रहे, लेकिन आराधना की रीति में अंतर आया। स्तुति-पाठ (Panegyric) पूर्व की भाँति चलते रहे, किन्तु वे देवताओं को प्रसन्न करने की प्रमुख रीति अब नहीं रहे। अब यज्ञ करना अधिक महत्वपूर्ण हो गया और यज्ञ के सार्वजनिक एवं घरेलू दोनों रूप प्रचलित हुए। यज्ञ में बड़े पैमाने पर पशुबलि (Animal Sacrifice) दी जाती थी। यज्ञों और मंत्रो का सृजन, अंगीकरण और विस्तारण ब्राहाणों ने किया। उन्होंने बहुत सारे अनुष्ठानों को चलाया, जो आर्येतर (Non - Aryan) लोगों से भी लिए गए थे।

पुरोहितों के प्रभुत्व तथा यज्ञ और कर्मकांडों के विरुद्ध वैदिक काल के अंतिम दौर में प्रबल प्रतिक्रिया आरंभ हुई और औपनिषदिक दर्शन (Aupnishadik Philosophy) का सृजन हुआ। इन दार्शनिक ग्रंथो में कर्मकांडों (Ceremonial Acts) की निंदा की गई है और यथार्थ, विश्वास एवं ज्ञान पर बल दिया गया।


 

प्रमुख दर्शन एवं उनके प्रतिपादक (Philosophies and their Exponders)
दर्शन (Philosophy) प्रतिपादक (Expounder)
चार्वाक (भौतिकवाद)  चार्वाक
संख्या  कपिल
योग्य  पतंजलि
न्याय  गौतम
पूर्व मीमांसा  जैमिनी
उत्तर मीमांसा  बदरायण
वैशेषिक  कणाद या उलूक

कुछ महत्वपूर्ण तथ्य


  • ऋग्वैदिक काल के दो प्रमुख देवताओं इन्द्र और अग्नि का अब पहले जैसा महत्व नहीं रहा। उनके स्थान पर अब प्रजापति जो देवकुल में सृष्टि के निर्माता थे, को सर्वोच्च स्थान दिया जाने लगा।
  • पशुओ के देवता रूद्र (Rudra) इस काल में एक महत्वपूर्ण देवता बन गए। उत्तर-वैदिक काल में इनकी पूजा शिव (Shiva) के रूप में होने लगी।
  • इस काल में पूषण ;शूद्रों के देवता' (God of Shudras) के रूप में प्रचलित थे।
  • ऋग्वैदिक काल में ही बहुदेववाद, वासुदेव सम्प्रदाय तथा षड्दर्शन अर्थात संख्या, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्व मीमांसा व उत्तर मीमांसा का बीजारोपण हुआ।
  • उत्तरवैदिक कॉल के अंतिम चरण में यज्ञों एवं कर्मकांडों की जटिलता एवं पुरोहित के प्रभुत्व के विरुद्ध एक प्रबल प्रतिक्रिया हुई और एक दार्शनिक विचारधारा का उदय हुआ। इसी पृष्ठभूमि में 600 B . C . के आसपास उपनिषदों का संकलन किया गया।
  • उपनिषदों में कर्मकांड की निंदा की गई और यथार्थ विश्वास एवं ज्ञान को महत्व दिया गया। इसके अनुसार आत्मा का ज्ञान एवं ब्रहा के साथ आत्मा के संबंधो के पता लगाने पर बल दिया गया है।
  • वृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्यक - गार्गी संवाद की चर्चा की गई है।
  • 'आरण्यकों' में भी वैदिक कर्मकांड की निंदा की गई है तथा इसमें यज्ञा एवं बलि की अपेक्षा तप पर बल दिया गया है, जबकि उपनिषदों में ज्ञान पर बल दिया गया है।


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