मध्यकालीन भारत का इतिहास - पूर्व मध्यकालीन भारत 800 से 1200 ईo (उत्तर भारत, बंगाल का पाल राजवंश, संस्कृति)

मध्यकालीन भारत का इतिहास

पूर्व मध्यकालीन भारत (800 से 1200 ई.)

उत्तर भारत : तीन साम्राज्यों  का काल (आठवीं से दसवीं सदी तक)


750 और 1000  ईस्वी के मध्य उत्तर भारत और दक्षिण भारत में कई शक्तिशाली साम्राज्यों का उदय हुआ। इनमे से तीन वंश ऐसे थे, जिन्होंने आपस में संघर्ष किया। यह संघर्ष कन्नौज पर आधिपत्य के लिए हुआ। इनमें से एक था पाल वंश, जिसका नवीं सदी के मध्य तक पूर्वी भारत में एक शक्तिशाली राज्य था। पश्चिमी भारत और उत्तरी गंगा की घाटी में दसवीं सदी तक प्रतिहार राजवंश का प्रभुत्व था। उधर दक्षिण भारत में राष्टकूटों का वर्चस्व था, जो समय-समय पर उत्तर भारत के प्रदेशो पर भी अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते थे। वस्तुतः इन तीनों शक्तिशाली साम्राज्यों के मध्य संघर्ष चलता रहा। यधपि इन साम्राज्यों के शासन राष्ट्रकूट वंश ने किया। वह न केवल उस काल का सबसे का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था, बल्कि उसके आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में उत्तर और दक्षिण भारत के मध्य सेतु का भी काम किया।

सांतवी सदी के पूर्वाद्ध से ही कन्नौज भारत की राजनीति का केंद्र बिंदु रहा था। उस काल में उत्तरी भारत पर आधिपत्य का कोई भी दावा कन्नौज पर अधिकार के बिना निरर्थक था। कन्नौज तथा उसके मध्यदेश का सामरिक महत्व भी था, क्योकि पालो के लिए मध्य भारत तथा पंजाब और प्रतिहारों एवं राष्ट्रकूटों के लिए गंगा दोआब में पहुँचने के मार्ग पर कन्नौज से ही नियंत्रण होता था। इसके अतिरिक्त गंगा-यमुना दोआब, जो प्रचुर मात्रा में राजस्व का स्रोत था। अतः इस पर बिना नियंत्रण किये कोई भी साम्राज्य शक्तिशाली नहीं हो सकता था

त्रिपक्षीय संघर्ष के चरण


कन्नौज पर अधिकार के लिए 8 वीं सदी के मध्य से आरंभ हुए राष्ट्रकूट, पल तथा गुर्जर-प्रतिहार राजवंश के मध्य के युद्ध को त्रिपक्षीय संघर्ष के नाम से जाना जाता है।

प्रतिहार शासक वत्सराज द्वारा कन्नौज पर आक्रमण के साथ ही संघर्ष की शुरुआत हुई। कन्नौज का शासन, इन्द्रायुद्ध पराजित हुआ तथा उसके वत्सराज का अधिपत्य स्वीकार कर लिया। प्रतिहार गंगा-यमुना के संगम तक पहुंच गए थे और पालो (बंगाल के शासन) का प्रभाव प्रयाग तक बढ़ गया था। परिणामस्वरूप युद्ध अवश्यंभावी हो गया। प्रतिहार नरेश वत्सराज एवं पाल नरेश धर्मपाल के मध्य उत्तर भारत पर विस्तार के लिए संघर्ष आरंभ हो गया। राष्ट्रकूट नरेश धुरुव ने इस संघर्ष में हस्तक्षेप किया एवं सबसे पहले वत्सराज को पराजित किया। त्रिपक्षीय संघर्ष में राष्ट्रकूट ही दक्षिण भारत की ऐसी पहली शक्ति थी जिसने उत्तर भारत की राजनीति में हस्तक्षेप किया तथा दक्षिण से उत्तर भारत पर आक्रमण किया। संभवतः धर्मपाल ने भी धुरुव का आधिपत्य स्वीकार कर लिया। फिर धुरुव दक्षिण को लौट गया। इन घटनाओं से अंतत: धर्मपाल लाभान्वित हुआ। धर्मपाल ने इन घटनाओं का लाभ उठाते हुए कन्नौज पर आक्रमण कर इन्द्रायुद्ध को अपदस्य कर दिया तथा उसकी जगह चक्रायुध को कन्नौज का शासन नियुक्त किया। चक्रायुध ने धर्मपाल का आधिपत्य स्वीकार कर लिया तथा धर्मपाल ने 'उत्तरपथस्वामिन' की उपधि धारण की। हालांकि इन घटनाओं के बारे में स्पष्ट तिथि का अभाव है।

त्रिपक्षीय संघर्ष के द्रितीय चरण में दो शक्तियाँ ही विधमान हुई। बंगाल का धर्मपाल और गुर्जर प्रतिहार का वत्सराज। कन्नौज क्षेत्र में इस समय आयुध वंश के दोनों भाई इन्द्रायुद्ध और चक्रायुध आपस में संघर्षरत थे। कन्नौज नरेश चक्रायुध को पल नरेश के संरक्षण के कारण स्वामित्व प्राप्त हुआ है।

त्रिपक्षीय संघर्ष का तृतीय चरण हुआ जब प्रतिहार शासन नागभटट द्रितीय ने 806 - 07 ई. के आसपास कन्नौज पर आक्रमण किया तथा चक्रायुद्ध और धर्मपाल को पराजित कर 810 ई. में कन्नौज को अपनी राजधानी बना लिया। धर्मपाल अब राष्ट्रकूट राजा गोविन्द तृतीय से मिल गया तथा गोविन्द तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण किया तथा नागभटट द्रितीय को पराजित किया। इसके पश्चात गोविन्द तृतीय दक्षिण वापस चला गया। प्रतिहारों और पालों की प्रतिदरंदरिता पुनः प्रांरभ हो गई, जिसमे पालों का पक्ष मजबूत था।

इस समय प्रतिहार वंश के शासन की बागडोर एक अत्यंत पराक्रमी शासन मीहिरभोज प्रथम के हाथों में थी तथा इसी ने प्रतिहार शक्ति का पुर्नोत्थान किया। उसने 836 ई. में कन्नौज पर आक्रमण किया, किंतु देवपाल द्वारा पराजित हो गया। 850 ई. में देवपाल की मृत्यु के बाद पाल शक्ति का पतन होने लगी। इसी बीच मीहिरभोज ने अपनी स्थिति  सुदृढ़ कर ली तथा अंततः 854 ई. के आसपास कन्नौज पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। इस समय राष्ट्रकूट शासन आमोघवर्ष ने हस्तक्षेप नहीं किया क्योकि चालुक्य शासन से उसका संघर्ष चल रहा था। कन्नौज पर अब प्रतिहार शासक शासन करने लगी।

कन्नौज पर राष्ट्रकूटों ने दो बार और आक्रमण किये, पहला इन्द्र तृतीय द्वारा 915 ई. में तथा दूसरा कृष्ण तृतीय द्वारा 963 ई. में। हालांकि प्रतिहार शासन कन्नौज पर अपना आधिपत्य स्थापित करने में सफल रहे, किंतु जल्दी ही उनके साम्राज्य का पतन हो गया।

त्रिपक्षीय संघर्ष, तीनों शक्तिशाली (प्रतिहार, राष्ट्रकूट, पाल) शक्तियो के लिए विनाशकारी साबित हुआ। तात्कालिन परिणाम यह हुआ कि प्रतिहार कन्नौज पर अपना शासन स्थापित करने में सफल हुए तथा राष्ट्रकूट अपने पारंपरिक शत्रु प्रतिहारों की शक्ति विनष्ट करने में सफल हुए। चूँकि पालों ने इस संघर्ष से अपने को पहले से ही अलग कर लिया था, लेकिन वे अपनी खोई हुई शक्ति को दोबारा प्राप्त करने में सफल नहीं हो सके। इस संघर्ष के फलस्वरूप महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि इससे उत्तरी भारत की शक्तियों की फिर से गुटबंदी आरंभ हो गई। उत्तर भारत की राजनीति में अब राजपूत शासकों का प्रभाव बढ़ने लगा तथा क्षेत्रीय राज्यों की संख्या में निरंतर वृद्धि होने लगी जिससे कोई भी राजवंश उत्तर एवं दक्षिण भारत पर एकछत्र राज्य स्थापित नहीं कर सका तथा ब्रहा शक्तियाँ भारत पर आक्रमण करने लगी।

बंगाल का पाल राजवंश


पल वंश की स्थापना संभवतः 750 ई. के आस पास बंगाल (गौड़) में हुआ था। शशांक की मृत्यु के पश्चात लगभग एक शताब्दी तक बंगाल में अराजकता और अव्यवस्था का माहौल बना हुआ था। उस क्षेत्र में फैली अराजकता से तंग आकर वहाँ के प्रमुख लोगों ने गोपाल को शासन चुना। यह पहला राजा था, जिसका जनता के द्वारा निर्वाचन हुआ। उसके गौड़ में फिर से सुव्यवस्था स्थापित की तथा करीब दो दशकों तक शासन किया। वह बौद्ध धर्म का अनुयायी था तथा उसने ओदंतपुरी महाविहार की स्थापना भी की थी। 770 ई. में उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र धर्मपाल राजा बना।

धर्मपाल ने बंगाल पर 770 से 810 ई. तक शासन किया। उसके राज्य का सर्वप्रथम विस्तार किया। कुछ समय के लिए उसके कन्नौज पर अपना अधिकार स्थापित किया था तथा उसने 'उत्तरपथस्वामिन' की उपाधि धारण की। वह बौद्ध धर्मानुयायी था किंतु वह अन्य धर्मो के प्रति भी सहिष्णु था। बिहार और आधुनिक पूर्वी उत्तर प्रदेश पर अपना-अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए पालों और प्रतिहारों के मध्य संघर्ष चलता रहा, यधपि बंगाल के साथ-साथ बिहार पर पालों का ही अधिक समय तक नियंत्रण कायम रहा।

धर्मपाल का उत्तराधिकारी उसका पुत्र देवपाल अगला शासन बना। देवपाल ने 810 से 850 ई. तक शासन किया तथा इसने भी साम्राज्य विस्तार की नीति जारी रखी। उसने मुंगेर को अपनी राजधानी बनाया, तथा प्रागज्योतिषपुर (असम) और उड़ीसा के कुछ हिस्सों को अपने साम्राज्य में मिला लिया। संभवतः आधुनिक नेपाल के एक हिस्से पर भी पाल प्रभुत्व स्थापित हो गया तथा उसने तिब्बत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के शैलेन्द्र साम्राज्य (सुमात्रा) से अपना सांस्कृतिक एवं व्यापारिक संबंध बनाये रखा। सुमात्रा के एक शासन, बलपुत्रदेव ने उससे नालंदा में एक मठ की स्थापना की अनुमति भी प्राप्त की। अरब यात्री सुलेमान ने देवपाल के शक्ति का वर्णन एवं साम्राज्य विस्तार की जानकारी दी है। देवपाल की मृत्यु के बाद पालवंश का पतन शुरू हो गया। उसके उत्तराधिकारी नारायण पाल को प्रतिहार शासन मिहिरभोज तथा महेन्द्रपाल के हाथों पराजय का सामान करना पड़ा तथा उसने, उनके हाथों मगध का क्षेत्र भी खो दिया। उसके उत्तराधिकारी राजयपाल ने राष्ट्रकूटों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करके, खोये हुए क्षेत्र को पुनः प्राप्त किया।

  • पाल वंश का पुनरोद्धार महिपाल के दवारा हुआ किंतु चोल शासन राजेन्द्र प्रथम के आक्रमण (1022 - 23 ) से राज्य को आर्थिक, सामाजिक क्षति उतनी पड़ी। महिपाल का उत्तराधिकारी नयपाल था जिसने प्रांरभ में कलचुरियों से युद्ध किया, किंतु बाद में कलचुरी राजकुमारी से विवाह कर लिया।
  • नयपाल की मृत्यु के बाद अव्यवस्था फ़ैल गयी, जिसका अंत रामपाल ने किया। उसने बंगाल, असम, उड़ीसा पर पुनः नियंत्रण स्थापित किया किंतु सेन शासकों के हाथों पूर्वी बंगाल तथा मिथिला (कर्नाटो के हाथों) को खो दिया। संध्याकर नंदी के रामचरित का नायक वही है।
  • पाल वंश का अंतिम शासन गोविन्द पाल था। यह संभवत: बख़ितयार खिलजी के आक्रमण के समय बंगाल में शासन कर रहा था, हालांकि यह नाम मात्र का शासन था तथा 12 वीं शताब्दी के अंत में बंगाल का पल राज्य, सेनवंश के अधिकार में चला गया।

पालकालीन संस्कृति


मूर्तिकला: पाल काल में कांस्य एवं प्रस्तर मूर्तिकला की एक नवीन शैली का उदय हुआ। धीमन और बिथपाल ने मूर्तिकला के क्षेत्र में अपना विशिष्ट योग्यदान दिया, जो धर्मपाल और देवपाल के समकालीन थे। इस समय की कांस्य मूर्तियाँ ढलवाँ किस्म की है। इसके साक्ष्य नालंदा तथा कुकीहार (गया के निकट) से मिले है, ये मूर्तियाँ मुख्य रूप से बुद्ध, बोधिसत्व, मंजुश्री, मैत्रेय तथा तारा की है। हालांकि इस काल की विष्णु, बलराम, सूर्य, उमा, महेश्वर, गणेश आदि हिन्दू-देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी मिलती है बोघगया में अवस्थित चतुर्भुज महादेव की मूर्ति धर्मपाल के शासनकाल में निर्मित हुई।

शिक्षा एवं साहित्य: पालवंशीय शासकों ने नालंदा, विक्रमशिला, ओदंतपुरी, सोमपुरी आदि में बौद्ध विहार एवं भवन बनवाये। गोपाल ने नालंदा में बौद्ध विहार बनवाया था। धर्मपाल ने विक्रमशिला और सोमपुर के विहारों की स्थापना तथा नालंदा महाविहार को 200 गाँव दान दिए थे। पाल शासकों ने तिब्बत, चीन और दक्षिण-पूर्वी एशिया के शैलेन्द्र राज्य से मित्रता की थी। बौद्ध विद्धान अतीश दीपंकर ने तिब्बत जाकर वहाँ महायान मत का प्रचार-प्रचार किया।

पाल स्थापत्य एवं चित्रकला: इस काल में वास्तुकला मुख्यतः ईट पर आधारित थी। नालंदा विश्वविद्यालय ईटो से निर्मित है। बिहार एवं बंगाल में मिले अवशेषों में चैत्यों और विहारों के साथ-साथ तालाबों का भी निर्माण करवाया गया था।

इस काल के चित्र मुख्यतः ताड़ पत्र पर बने हुए है। इनमें काले, नीले, लाल, बैंगनी तथा हल्के गुलाबी रंगो का प्रयोग हुआ है। पालकालीन चित्रकला पर तांत्रिक प्रभाव स्पष्टतः परिलक्षित होता है। नालंदा से कुछ भिन्न- चित्र भी प्राप्त हुए है।

दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ पाल शासकों के व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध थे। दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापार काफी लाभदायक था।

गुर्जर - प्रतिहार वंश


गुर्जर - प्रतिहारों का उदभव गुजरात या दक्षिण - पश्चिम राजस्थान में हुआ था। गुर्जर - प्रतिहारों ने 8 वीं शताब्दी से लेकर 11 वीं शताब्दी तक शासन किया। इस राजवंश का संस्थापक हरिश्चन्द्र को माना जाता है।

नागभटट प्रथम के राज्यकाल में प्रतिहारों की शक्ति और सुदृढ़ हो गई। इस राजवंश के चौथे शासन वत्सराज ने प्रतिहार राज्य को साम्राज्य में बदलने का प्रयास किया। इसी के समय त्रिपक्षीय संघर्ष प्रांरभ हुआ था जिसमे इसने भाग लिया, लेकिन पालों तथा राष्ट्रकूट ने उसकी महत्वाकांक्षा पर अंकुश लगा दिया।

प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक और इस राजवंश का महानतम शासन भोज था। उसने 836 ई. के लगभग कन्नौज पर कब्ज़ा कर लिया और कन्नौज प्रतिहार राज्य की राजधानी लगभग एक सदी तक बना रहा। भोज ने पूर्व की ओर विस्तार करना चाहा, किन्तु पाल शासकों ने उसे परास्त कर दिया। अरब यात्रियों के विवरण से ज्ञात होता है कि प्रतिहारों के पास भारत में सबसे अच्छी अश्वरोही सेना थी। क्योकि इस समय मध्य एशिया और अरबदेश से घोड़ो का आयात भारतीय व्यापार का एक महत्वपूर्ण अंग था। पाल शासन देवपाल की मृत्यु के पश्चात भोज ने पूर्व की ओर भी अपने साम्राज्य का विस्तार किया। भोज विष्णु का भक्त था और उसने 'आदिवराह' का विरुद्ध धारण किया था। उसके कुछ सिक्कों पर 'आदिवराह' शब्द अंकित है। उज्जैन के भोज परमार से उसका अंतर बताने के लिए उसे मिहिरभोज भी कहा जाता है।

भोज की मृत्यु संभवतः 885 ई. के आसपास हुई। उसके बाद उसका बेटा प्रथम महेन्द्रपाल राजा बना। उसने मगध तथा उत्तरी बंगाल को जीता तथा पूर्व साम्राज्य विस्तार को सुरक्षित रखा। उसने काव्य मीमांसा तथा कर्पूरमंजरी के रचयिता राजशेखर को संरक्षण प्रदान किया। बगदाद यात्री अल-मसूदी ने 915 - 16 ई. में गुजरात की यात्रा की थी।

915 ई. से 918 ई. के मध्य राष्ट्रकूट शासन इन्द्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण और नगर को तहस-नहस कर दिया। इससे गुर्जर - प्रतिहार वंश कमजोर हो गया। संभवत: गुजरात राष्ट्रकूटों के अधिकार में चला गया। 963 ई. में कृष्ण तृतीय (राष्ट्रकूट राजा) ने उत्तर भारत पर आक्रमण करके प्रतिहार शासन को परास्त कर दिया। इसके पश्चात प्रतिहार साम्राज्य का पतन हो गया।

प्रतिहार शासन ज्ञान- विज्ञानं और साहित्य के उंदार संरक्षण थे। संस्कृत का महान कवि और नाटककार राजशेखर, भोज के पौत्र महिपाल के दरबार में रहता था। प्रतिहार शासकों ने कई भव्य भवन और मंदिर बनवाये तथा इस काल में भी भारत और पश्चिम एशिया के बीच विद्वानों का आदान-प्रदान और वाणिज्य- व्यापार चलता रहा।

राष्ट्रकूट राजवंश


इस राज्य की स्थापना दंतिदुर्ग (735 - 755 ई.) ने की थी। जिसने आधुनिक शोलापुर के निकट मान्यखेट या मालखेड़ को अपनी राजधानी बनाया। राष्ट्रकूट शासकों ने जल्द ही उत्तर महाराष्ट्र के पूरे प्रदेश पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। दंतिदुर्ग ने काँची, कलिंग, मालवा आदि क्षेत्रों में साम्राज्य विस्तार किया। इसके पश्चात कृष्ण प्रथम (756 - 772 ) ने साम्राज्य को विस्तृत किया। वह कला प्रेमी था, उसने एलोरा का सुप्रसिद्ध कैलाश मंदिर बनवाया। राष्ट्रकूट वंश का त्रिपक्षीय संघर्ष में आगमन धुव (780 - 93 ) के शासनकाल में हुआ। उसने वत्सराज और धर्मपाल, दोनों ही को पराजित किया था।

गोविंद तृतीय (793 ई. - 793 ई. ) और अमोघवर्ष (814 ई. - 878 ई. ) राष्ट्रकूटकालीन महान शासन हुए। एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि गोविंद तृतीय ने केरल, पांड्य तथा चोल राजाओं को भयभीत कर दिया और पल्ल्वों को श्रीहीन बना दिया।

अमोघवर्ष धर्म और साहित्य में अधिक रूचि लेता था। वह स्वंय कन्नड़ लेखक था और उसे राजनीति पर कन्नड़ की प्रथम कृति की रचना करने का श्रेय दिया जाता है। अमोघवर्ष के शासनकाल में अनेक विद्रोह हुए जिन्हें बड़ी मुश्किल से दबाया गया था

इस वंश का अंतिम प्रतापी राजा कृष्ण तृतीय (934 ई. से 96 ई.) हुआ। उसे मालवा (परमार) और वेंगी के शासकों (चालुक्य, पूर्वी) से युद्ध करना पड़ा। इसने तंजौर के चोल शासन के विरुद्ध भी सैनिक अभियान किया। चोलों ने काँची के पल्ल्वों का राज्य छीन लिया था लेकिन कृष्ण तृतीय ने चोल - राजा परांतक प्रथम को पराजित करके (949 ई. ) चोल साम्राज्य के उत्तरी भाग पर अधिकार कर लिया। कृष्ण तृतीय की मृत्यु के पश्चात सभी विरोध शासन उसके उत्तराधिकारी के खिलाफ एकजुट हो गए और 972 ई. में राष्ट्रकूटों की राजधानी मान्यखेट को जीतकर उन्होंने वहाँ आग लगा दी । इसके साथ ही राष्ट्रकूट साम्राज्य का अंत हो गया।

दक्षिण भारत में राष्ट्रकूट शासन 10 वीं सदी के अंत तक लगभग दो सौ वर्ष तक चलता रहा। राष्ट्रकूट शासन धार्मिक सहिष्णु थे। उन्होंने न केवल शैव और वैष्णव धर्म को भी बढ़ावा दिया। राष्ट्रकूट शासन कृष्ण प्रथम ने एलोरा में शिव मंदिर नवीं सदी में बनवाया था। अमोघवर्ष जैन मतानुयायी था।

राष्ट्रकूट राजा कला और साहित्य के महान संरक्षक थे। उनके दरबार में न केवल संस्कृत के विद्धान थे, बल्कि अनेक ऐसे कवि और लेखक भी थे, जो प्राकृत तथा अपभ्र्रंश में लिखते थे। महान अपभ्र्रंश कवि स्वयंभू और उसके पुत्र राष्ट्रकूट दरबार में ही रहते थे। इस काल के प्रसिद्ध विद्या केन्द्रों में कन्हेरी के बौद्ध विहार की चर्चा की जा सकती है। इन्होंने पल्ल्व स्थापत्य शैली से प्रेरणा ली और इसे अधिक उन्नत स्वरूप प्रदान किया। ठोस चटटानो को काटकर मंदिरों को बनाने की कला इस काल में अपने चरमोतकर्ष पर पहुँची।

राष्ट्रकूट काल में कन्नड़ तथा संस्कृत भाषा में अनेक ग्रंथों की रचना हुई थी, जिनमे प्रमुख है:-

  • जिनसेन - आदिपुराण हरिवश
  • महावीराचार्य - गणितसार संग्रहण
  • अमोघवर्ष - कविरजमार्ग

विविध

  • धर्मपाल एक उत्साही बौद्ध था, उसके लेखों में उसे परमसौग़ात कहा गया है तथा उसकी राजसभा में प्रसिद्ध बौद्ध विद्धान हरिभद्र निवास करते थे।
  • देवपाल के उत्तराधिकारी विग्रहपाल (850 - 854 ई.) ने अपने पुत्र नारायणपाल के पक्ष में सिंहासन छोड़कर संन्यास ग्रहण कर लिया।
  • नारायण पाल ने शिव के सम्मान में एक हजार मंदिरों का निर्माण करवाया।
  • महिपाल प्रथम को पाल वंश का दूसरा संस्थापक माना जाता है। इसके काल में राजेन्द्र चोल ने बंगाल पर आक्रमण किया तथा पाल शासन महिपाल को पराजित किया।
  • रामपाल के ही शासन काल में कैवर्तों का विद्रोह हुआ था जिसका उल्लेख रामपाल चरित में मिला है।
  • नवीं शताब्दी के मध्य में सुलेमान यात्री ने पाल साम्राज्य को 'रुहमा' कहा था।
  • राष्ट्रकूट बादामी के चालुक्यों के सामंत थे।
  • दंतिदुर्ग ने उज्जयिनी में 'हिरण गर्भ' (महादान) यज्ञ किया जिसमे प्रतिहार राजा ने द्धारपाल का काम किया था।
  • राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम 756 ई. में शासन बना जिसने बादामी के चालुक्यों के अस्तित्व को पूर्ण रूप से नष्ट कर दिया।
  • राष्ट्रकूट शासक गोविन्द्र तृतीय ने पल्ल्व, पाण्ड्य, केरल तथा गंग राजाओं द्वारा बनाए गए संघ को ध्वस्त कर दिया।
  • अमोघवर्ष ने 'कविराजमार्ग' नामक कन्नड़ भाषा में एक काव्य ग्रंथ की रचना की तथा मान्यखेत नामक नया नगर बसाया तथा इसी को अपने राज्य की राजधानी बनाया।
  • कृष्ण तृतीय ने रामेश्वरम में कृष्णेश्वर तथा गण्डमार्तण्डादित्य नामक मंदिर बनवाये। उसकी राजसभा में कन्नड़ भाषा का कवि पोन्न निवास करता था जिसने शांतिपुराण की रचना की थी।
  • 974 - 75 में चालुक्य राजा तैलप द्रितीय ने राष्ट्रकूट वंश के अंतिम शासन कर्क द्रितीय को परास्त करके राष्ट्रकूट राज्य पर अधिकार कर लिया।
  • प्रतिहार शासक नागभटट प्रथम (730 - 756 ई.) ने अरबों के आक्रमण को रोका तथा ग्वालियर प्रशसित में उसे 'पलच्छो का नाशक ' बताया गया है।
  • भोज वैष्णव धर्मानुयायी था। उसने आदिवाराह तथा प्रभास जैसी उपाधियां धारण की, जो उसके द्वारा चलाये गये चांदी के द्रम्म सिक्कों पर भी अंकित है।
  • महेन्द्रपाल प्रथम ने परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर जैसी उपाधि धारण की, इसकी राजसभा में प्रसिद्ध विद्धान राजशेखर निवास करते थे जो इसके राजगुरु थे। राजशेखर ने कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा, विद्धशालभंजिका, बालभारत, बालरामयण, भुवनकोश तथा हरविलास जैसे प्रसिद्ध जैनग्रंथ की रचना की।
  • राजशेखर ने गुर्जर - प्रतिहार राज्य को पश्चिमी भारत का दूसरा सबसे बड़ा राज्य कहा है।
  • प्रतिहार वंश का अंतिम शासन यशपाल (1036 ई.) था।