पूर्व मध्यकालीन भारत 800 से 1200 ईo (भारत पर अरबो का आक्रमण : ऐतिहासिक महत्व)

मध्यकालीन भारत का इतिहास

पूर्व मध्यकालीन भारत (800 से 1200 ई.)

भारत पर अरबो का आक्रमण : ऐतिहासिक महत्व


भारत और अरब के बीच 7 वी सदी में ही संपर्क आरम्भ हो गए थे । लेकिन राजनीतिक संबंध 712 इ में सिंध पर आक्रमण के दौरान स्थापित हुआ। भारत में अरबो के आगमन का राजनीतिक दृष्टि से उठना महत्व नहीं है, जितना अन्य पक्षों का है। अरब आक्रमणकारी भारत उस प्रकार का साम्राज्य नहीं बना रही। किन्तु दीर्घकालीन परिणामो की दृष्टि से प्रतीत होता है कि अरबो ने भारतीय जनजीवन को अत्यधिक प्रभावित किया और स्वयं भी प्रभावित हुए।

यधपि इससे पूर्व में भी भारत पर शक, यवन कुषाण, हूण, आदि का आक्रमण हुआ था किन्तु भारतीय संस्कृति ने इन्हे आत्मसात कर लिया। उन्होंने भारतीय धर्म तथा सामाजिक आचार विचारो को ग्रहण किया और अपनी विशिष्टता खो बैठे । उनका एक - दूसरे के ऊपर प्रभाव भी पड़ा तथापि हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही भारतीय समाज में अपनी विशिष्ट संस्कृतियों के साथ विधमान रहे। अरबो ने चिकित्सा , दर्शनशास्त्र , नक्षत्र विज्ञान, गणित और शासन प्रबंध की शिक्षा भारतीयों से ली। ब्रह्मगुप्त की पुस्तकों का अल्फजारी ने अरबी में अनुवाद किया। अलबरूनी कहता है कि पंचतंत्र का अनुवाद भी अरबी में हो चुका था। सूफी धार्मिक संप्रदाय का उद्भव स्थल सिंध ही था जहां अरब लोग रहते थे। सूफी मत पर बौद्ध धर्म का प्रभाव देखा जा सकता है। दशमलव प्रणाली अरबो ने 9 वी सदी में भारत से ही ग्रहण की थी।

यदि तात्कालिक दृष्टि से देखा जाये तो कहा जा सकता है कि अरबो ने एक ऐसी चुनौती पेश की जिसका सामना करने के लिए ऐसी शक्तियां उदित हुई, जो भारत में आगामी तीन सौ वर्षो तक बनी रही। गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट चालुक्यों की स्थापना न करके धार्मिक सहिष्णुता का प्रदर्शन किया। हालांकि जजिया कर लिया जाता था। अरबो का भारत आगमन का आर्थिक महत्व व्यापार के क्षेत्र में देखा जा सकता है। अरब व्यापारियों के समुंद्री एकाधिकार के साथ भारतीय व्यापारियों ने तालमेल बनाया और पश्चिमी जगत एवं अफ़्रीकी प्रदेशो में अपनी व्यापारिक गतिविधियों को गतिशील बनाये रखा।

इस्लाम के संम्पर्क में आने से भारतीय समाज में बहुत परिवर्तन परिलक्षित हुए जैसे:

  • कुलीन हिन्दुओ ने मुसलमानो के समान पोशाक पहनना आरम्भ कर दिया जैसे - लम्बी बाहो वाला कुर्ता-पायजामा आदि।
  • हिन्दू समाज में मघपान तथा मांसाहार का प्रचलन अधिक बढ़ गया।
  • दरबारी शिष्टाचार अपनाना।

हिन्दुओ ने अपनी जातीय शुद्धता बनाये रखने के लिए नियमो को अत्यधिक कठोर बना दिया जैसे - अंतर्जातीय विवाह बांध , बाल विवाह व् पर्दा प्रथा का प्रचलन, स्त्रियों की स्वतंत्रता समाप्त, राजपूत समाज में जौहर प्रथा आदि। हिन्दुओ तथा मुसलमानो के साथ - साथ रहने के कारण दोनों के धर्मो का भी एक दूसरे के ऊपर प्रभाव पढ़ा। इस्लामी प्रभाव के कारण हिन्दू धर्म के अंदर कुछ नविन संम्प्रदायो का उदय हुआ। पूर्वमध्यकाल के भक्ति आंदोलन को इस्लाम के आगमन का अप्रत्यक्ष प्रभाव माना जा सकता है, क्योकि भक्ति के मूल तत्व हिन्दू धर्म में बहुत पहले से ही विधमान रहे है।

  • हिन्दू सूफी संतो का सम्मान करने लगे।
  • अजमेर दरगाह पर जाने वाले हिन्दुओ की संख्या में वृद्ध।
  • हिन्दू धर्म में कट्टरता कम।
  • शुद्रो को मंदिरो में प्रवेश की अनुमति।

इस्लामी प्रभाव के फलस्वरूप प्रादेशिक भाषाओ तथा उनके साहित्य की प्रगति हुई। कुतुबन, मंझन, मलिक, मोहम्मद जयासी जैसे सूफी संतो ने हिंदी भाषा में ग्रन्थ लिखे तथा 14वीं सदी में अमीर खुसरो हिंदी की खड़ी बोली भाषा के जनक माने जाते है । हिंदी भाषा के साथ - साथ इस्लामी प्रभाव से मराठी, गुजरती, बंगाली भाषाओ के साहित्य भी इस काल में समृद्ध हुए।

इस्लामी सभ्यता तथा संस्कृति का सबसे अधिक प्रभाव भारतीय ललित कलाओ विशेषकर स्थापत्य कला के ऊपर पड़ा। हिन्दुओ ने इस्लामी कला के प्राय : सभी उपयोगी एवं सुन्दर तत्वों का समायोजन अपनी कला में कर लिया।

  • जैसे - भवनों तथा मंदिरो में मेहराबा तथा गुंबदों का प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया । उदहारण के लिए वृन्दावन के कई मंदिरो में इस्लामी कला शैली का प्रभाव।
  • अंलकारिता कम हुई ।
  • आमेर के रूमानी नगर की इमारतों, राजमहलों, (बीकानेर), जोधपुर एवं ओरछा के दुर्गो, डींग के भवनों में इस्लामी कला शैली का प्रभाव देखा जा सकता है ।

किन्तु हिन्दुधर्म तथा संस्कृति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ । दोनों संस्कृतियों के समन्वय , सम्मिश्रण तथा सामंजस्य के बावजूद भी भारत में हिन्दुओ तथा मुसलमानो ने अपनी विशिष्टता ने अपनी विशिष्टता अंत तक बनायीं रखी जो आज भी दिखाई पढ़ती है।

विविध

  • अलफ़जारी ने ब्रह्मसिद्धान्त तथा खण्डखाद्य (ब्रह्मगुप्त) पुस्तकों का अरबी भाषा में अनुवाद किया।
  • पंचतंत्र का अनुवाद अरबी भाषा में कलिलावादिनंना नाम से हुआ।
  • अरबो ने सिंध में ऊंठ पालन तथा खजूर की खेती का प्रचलन किया।
  • अरबो ने दिरहम नामक सिक्के का सिंध में प्रचलन किया।
    अरब आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम ने सिंधवासियो पर जजिया नामक कर पहली बार लगाया और वसूला।

तुर्को का आगमन


तुर्को के आक्रमण के पूर्व अरबो ने भारत पर आक्रमण किए किन्तु भारत में मुस्लिम शासन की स्थापना का श्रेय तुर्को को जाता है। मुस्लिम आक्रमण के समय भारत में एक बार पुनः विकेन्द्रीकरण तथा विभाजन की परिस्थितिया सक्रीय हो उठी। तुर्क आक्रमण भारत में कई चरणों में हुआ। प्रथम चरण का आक्रमण 1000 से 1027 ई के बीच, गजनी के शासक मेहमूद द्वारा किया गया । इसके पूर्व सुबुक्तगीन (महमूद के पिता) की लड़ाई हिन्दुशाही शासको के साथ हुई थी, किन्तु उसका क्षेत्र सीमित थे। कालांतर में गौर के शासक शिहाबुद्दीन मोहम्मद ने पुनः भारत में सैनिक अभियान किया। 1175 से 1206 ई के बीच उसने और उसके दो प्रमुख सेनापतियों (ऐबक और बख्तियार खिलजी) ने गुजरात , पंजाब से लेकर बंगाल तक के क्षेत्र को जीतकर सत्ता स्थापित की। किन्तु 1206 ई में गोरी की मृत्यु के पश्चात तुर्क साम्राज्य कई हिस्सों में बंट गया और आगे चलकर भारत में दिल्ली सल्तनत नाम से तुर्क साम्राज्य स्थापित हुआ।

तुर्क आक्रमणों के पूर्व भारत के राज्यों की स्थिति


मुल्तान तथा सिंध दोनों क्षेत्र 8 वी सदी के आरम्भ में ही अरबो के सत्ता के अवशेष अब भी बने हुए थे। हिन्दुशाही राजवंश उत्तर-पश्चिम भारत का विशाल हिन्दू राज्य था, जिसकी सीमा कश्मीर से मुल्तान तक तथा चिनाव नदी से लेकर हिन्दुकुश तक फैली थी। महमूद ने इसकी राजधानी वैहिंद पर आक्रमण कर दिया तथा यहां का शासक जयपाल था, जिसने पराजित होने पर आत्महत्या कर ली। उत्तरी भारत में स्थित कश्मीर का क्षेत्र महमूद गजनवी के आक्रमण के समय से राजनैतिक अव्यवस्था से ग्रसित था । यहां की वास्तविक शासिक क्षेत्रगुप्त की पत्नी दीधा थी।

उपयुर्क्त राज्यों के अतिरिक्त मुस्लिम आक्रमण के समय उत्तरी भारत में अनेको छोटे - छोटे राज्यों का अस्तित्व था।

  • तुर्क आक्रमण के समय भारत छोटे - छोटे सैकड़ो राज्यों में विभक्त था। जैसे - सिंध, मुल्तान, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बंगाल आदि।
  • भारत का इस समय बाहं देशो के साथ कोई विशेष संबंध नहीं था।
  • राज्यों का आर्थिक आधार कमजोर था जिसके फलस्वरूप सैन्य आधार भी कमजोर हो गया।

राजनैतिक विभाजन की यह समस्या केवल राजपूत राज्यों तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि इसका परिणाम देश के सामान्य जनजीवन पर भी पड़ा था। उत्तर भारत में राजनैतिक एकता का पूर्णतः अभाव था। इस समय छोटे - छोटे राज्य सारे देश में बने हुए थे, परन्तु कोई भी एक राज्य या शासक इतना शक्तिशाली नहीं था, जो इन्हे जीतकर एकछत्र राज्य स्थापित कर सके। आंतरिक कलह ने इन्हे कमजोर बना दिया था और विदेशी आक्रमण का प्रभावशाली ढंग से विरोध करना इनके लिए संभव नहीं था। इस स्थिति के लिए राजपूत शासक जिम्मेदार थे, क्योंकि ये हमेशा आपस में संघर्षरत रहते थे। आंतरिक अशांति की इस परिस्थिति ने अंततः राजपूत शासको का अस्तित्व समाप्त कर दिया।

प्रमुख आक्रमण


महमूद गजनी 998 ई में शासक बना। वह एक दूरदर्शी एवं महत्वकांशी शासक था, जिसने अपने साम्राज्य विस्तार के लिए आंतरिक एवं बाहं क्षेत्रों को विजित किया। इन युद्धों के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन एकत्र करने के लिए महमूद ने भारत पर कई बार आक्रमण किए।

  • महमूद का पहला आक्रमण 1000 ई में हुआ। यह आक्रमण हिन्दुशाही राज्य पर हुआ था। वह इसके कुछ सीमावर्ती क्षेत्र पर कब्ज़ा करके वापस चला गया।
  • 1000 - 1002 में महमूद ने पेशावर और वैहिंद पर अभियान किया तथा यहां के शासक जयपाल को बंदी बना लिया और राजधानी पर नियंत्रण स्थापित किया। महमूद ने धन लेकर जयपाल को छोड़ दिया, किन्तु जयपाल ने अपना राज्य आनंदपाल को सौप कर आत्महत्या कर ली।
  • 1004 - 1005 ई० में महमूद ने मुल्तान पर आक्रमण किया। वहां का शासक करामिता संप्रदाय का दाऊद था। इसने आनंदपाल से सहायता मांगी लेकिन महमूद ने आनंदपाल को पहले पराजित किया फिर दाऊद को आत्मसमर्पण के लिए विवश किया।
  • 1018 ई० में महमूद ने सर्वप्रथम गंगा घाटी के क्षेत्र पर आक्रमण किया। यहां गुर्जर - प्रतिहार शासक के प्रतिनिधि राज्यपाल का शासन था। मार्ग में बाड़नूंदर (बुलन्दशहर) के राजा हरदत्त ने बिना युद्ध किए आत्मसमर्पण कर दिया तथा मथुरा के शासक कुलचंद युद्धभूमि में मारे गए । महमूद ने मथुरा और निकटवर्ती क्षेत्र में लगभग 1000 मंदिरो को नष्ट कर दिया।
  • 1019 - 20 ई० में उसने कालिंजर के शासक नन्द को पराजित कर दिया।
  • 1021 - 22 ई० में महमूद ने पुनः पंजाब में प्रवेश किया और इस बार उसने पंजाब का प्रशासन अपने अधीन करने का निश्चय किया।
  • भारत में महमूद का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अभियान (1025 - 1026 ई . में) सोमनाथ के मंदिर का था। यह मंदिर गुजरात राज्य में स्थित है। उसने सोमनाथ के मंदिर से अपार धन संपदा एकत्र की और उसे ध्वस्त कर दिया। इसके पश्चात उसने अन्हिलवाड़ा के शासक परमदेव पर चढाई और उसे पराजित कर दिया।
  • महमूद ने 1027 में जाटो पर आक्रमण किया और उन्हें पराजित कर दिया।

मुहम्मद गोरी के प्रमुख अभियान


  • मुहम्मद गौरी ने अपना भारतीय अभियान 1175 ई० में प्रारम्भ किया । उसने मुल्तान और उच्छ पर चढाई की और अपना नियंत्रण स्थापित किया।
  • उसने (मुहम्मद गौरी) गुजरात पर 1178 ई० में चढाई की , परन्तु गुजरात के शासक भीम द्वारा उसे पराजित कर दिया गया।
  • 1179 ई० में उसने पेशावर पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। 1181 से 1184 ई . में मध्य उसने सियालकोट पर तीन बार आक्रमण किया और अंततः उस पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।
  • 1186 ई० में उसने लाहौर को जीत कर वहां के शासक खुसरू मलिक को बंदी बना लिया।
  • 1191 ई० के तराईन के प्रथम युद्ध में गौरी दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान से पराजित हो गया।
  • 1192 ई० में उसने तराईन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को पराजित कर दिया।
  • 1194 ई० में गौरी ने चंदावर के लड़ाई में कनौज के शासक जयचंद को पराजित किया।

इस विजय के पश्चात् तुर्को का नियंत्रण पूर्वी उत्तर प्रदेश में बनारस तक स्थापित हो गया। इसके पश्चात् राजपूतो के कुछ विद्रोहों का मुहम्मद गोरी ने दमन किया और गुजरात पर भी सैनिक अभियान किया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने अन्हिलवाड़ा के नगरों को लूटा और अन्य क्षेत्रों में हुए राजपूतो के विद्रोह का उन्मूलन किया। इसी समय एक अन्य सेना नायक इब्ने बख्तियार खिलजी द्वारा बिहार एवं बंगाल पर कब्ज़ा किया गया।

1206 ई० में मुहम्मद गोरी भारत से वापस जाते हुए सिंध नदी के पास कुछ लड़ाक जातियों के हमले में मारा गया। उसने अपनी योग्यता एवं दूरदर्शिता के बल पर भारत में तुर्की साम्राज्य की स्थापना की। उसके मृत्यु के बाद भारत में तुर्की साम्राज्य का शासक कुतुबुद्दीन ऐबक बना। जिसने गुलाम वंश की नीव रखी और आगे चलकर यही साम्राज्य दिल्ली सल्तनत के नाम से जाना गया।

विविध


  • मुहम्मद गजनवी के भारत पर आक्रमण का उल्लेख हेनरी इलियट ने किया है।
  • महमूद गजनवी के सिक्को पर सिर्फ आमिर महमूद अंकित है।
  • मुहम्मद गौरी के गुजरात (सोमनाथ) आक्रमण के समय वहां का शासक भीम प्रथम था।
  • महमूद के दरबार में अलबरूनी , फिरदौसी, उतबी आदि विद्वान थे। अलबरूनी महमूद के आक्रमण के समय भारत आया, जिसकी प्रसिद्ध पुस्तक 'किताबुलहिन्द' तत्कालीन इतिहास जानने की महत्वपूर्ण सामग्री है।

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