मध्यकालीन भारत: खिलजी वंश 1200-1320 ई० (जलालुद्दीन खिलजी, अलाउद्दीन खिलजी)

मध्यकालीन भारत का इतिहास

खिलजी वंश : 1200 - 1320 ई०

13वी सदी के मध्य में तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रारम्भिक विस्तार करने की लहर के शांत हो जाने के बाद, सुल्तानों का मुख्य उद्देश्य सल्तनत को दृड़ता प्रदान करना था। अत: खिलजी वंश की स्थापना तक सल्तनत की प्रारम्भिक सीमाओं में कोई विशेष वृद्धि नहीं हो पायी। 13वी सदी के अंत में तुर्की शासन को खिलजी वंश द्वारा हस्तगत कर लिया गया। इस समय क्षेत्रीय प्रसार एक राजनैतिक आवश्कता थी। पडोसी राज्य शक्तिशाली हो गए थे और उनके द्वारा किया गया कोई भी संगठित प्रयास एक राजनैतिक आवश्कता थी। पडोसी राज्य शक्तिशाली हो गए थे और उनके द्वारा किया गया कोई भी संगठित प्रयास दिल्ली सल्तनत के लिए संकट उत्पन्न कर सकता था। इसके अलावा अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में जहां एक और इन हमलो का कारण क्षेत्रीय प्रसार था वही वह धन एकत्रित करने कि और भी बड़ा। 14वी सदी ई के प्रारम्भ में इन दोनों कारको ने क्षेत्रीय विस्तार को गति प्रदान की।

खिलजी शासको की सरल विजय ने यह सिद्ध कर दिया था कि जातीय निरकुंशता और अधिक समय तक राज नहीं कर सकती थी। खिलजी सर्वसाधारण वर्ग के थे। इसके अतिरिक्त खिलजी वंश के शासक तुर्क थे परन्तु इनकी शासन व्यवस्था पिछले इल्बरी – तुर्कों की शासन – व्यवस्था से भिन्न थी। इन्होने भारतीय मुसलमानों को बड़े प्रशासनिक पदों पर नियुक्त करने की प्रथा प्रारम्भ की। खिलजियो का विद्रोह मुख्यतया भारतीय मुसलमानों का उन तुर्कों के विरुद्ध विद्रोह था जो – दिल्ली के बजाय गौर और गजनी से प्रेरणा पाते थे। इन्होने कुलीनता के सिधांत के बजाय प्रतिभा को अधिक महत्व दिया। खिलजी शासको ने खासकर अलाउद्दीन ने राजनीति को धर्म से प्रथक रखने का प्रयास भी किया। इन सभी कारणों से खिलजियो द्वारा सत्ता पर नियंत्रण केवल एक वंश से दुसरे वंश का बदलाव नहीं रहा बल्कि भारतीय इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत थी। इन्ही सभी परिवर्तनों के आधार पर मोहम्मद हबीब ने खिलजी वंश की स्थापना को ‘खिलजी क्रान्ति’ के नाम से संबोधित किया है।

जलालुद्दीन फिरोजशाह खिलजी (1290 से 1296 ई तक)

खिलजी वंश का संस्थापक मलिक फ़िरोज़ था जिसने भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने के बाद जलालुद्दीन की पदवी धारण कर ली। इसने बलबन (इल्बरी तुर्क) के शासनकाल में एक अच्छे सेनानायक के रूप में प्रसिद्ध प्राप्त के थी। उसने कई अवसरों पर मंगोल आक्रमणकारियों का मुकाबला किया और सफलता प्राप्त की। 13जून, 1290 ई को कैकुबाद द्वारा निर्मित किलोखरी के महल में जलालुद्दीन ने अपना राज्याभिषेक करवाया और सुल्तान बन गया।

जब वह सुल्तान बना तो उसके उम्र 70 वर्ष थी, जिसकी झलक उसके शासन में भी दिखाई देती है। क्षेत्रीय प्रसार के कार्यक्रम को कार्यान्वित करने के लिए जलालुद्दीन खिलजी के पास न तो इच्छाशक्ति थी और न ही संसाधन। उसके छ: वर्ष के शासन को सुल्तान की नीतियों तथा उसके समर्थको के बीच सामंजस्य बनाए रखने के आंतरिक कलह ने मानो जकड लिया था। जलालुद्दीन का राजवंश से कोई सम्बन्ध नहीं था और दिल्ली की जनता जो एक लम्बे समय से इनके पूर्व के शासको (इल्बरी तुर्क) के शासन से परेशान थी, जलालुद्दीन और अन्य के शासन करने के अधिकार को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। वस्तुत: दिल्ली सल्तनत को उस समय जलालुद्दीन जैसे उदार शासक की आवश्यकता नहीं थी बल्कि एक कठोर और अनुशान्प्रिय शासक की जरुरत थी।

जलालुद्दीन की नीति तुर्की सरदारों एवं बलबन के सम्बन्धियों के प्रति संतुष्ट करने की थी। जो जिस पद पर था, उस उसने बना रहने दिया। साम्राज्य-विस्तार में भी उसे कोई सफलता नहीं मिली तथा पर उसका अभियान विफल रहा और मंगोलों के साथ उसने संधि कर ली। इल्बरी सामन्तो को हटाने के लिए उसने कोई प्रयास नहीं किया।

मुसलमानों का दक्षिण भारत पर प्रथम आक्रमण जलालुद्दीन के समय देवगिरी के शासक रामचंद्र देव पर हुआ। विद्रोहियों के प्रति जलालुद्दीन ने दुर्बल नीति अपनाई और कहा “मै एक वृद्ध मुस्लमान हू और मुसलमानों का रक्त बहाने की मेरी आदत नहीं है।” जलालुद्दीन के काल में लगभग दो हज़ार मंगोल इस्लाम धर्म को स्वीकार कर दिल्ली के निकट मुगलपुर (मंगोलपुरी) में बस गए जो नवीन मुसलमान कहलाए।

इन सभी कठिनाइयों का समाधान सुल्तान जलालुद्दीन की हत्या के रूप में हुआ। अली गुर्शस्प ने जलालुद्दीन को कड़ा बुलाकर धोके से हत्या कर दी और सत्ता पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

अलाउद्दीन खिलजी (1290 – 1316 ई)


अलाउद्दीन ने जलालुद्दीन खिलजी के उदारता और मानवतावाद के सिधान्तो को अस्वीकार कर दिया। उसने भयभीत करने के सिधांत को अपने शासन संचालन का आधार बनाया। इस सिधांत को अमीरों तथा आम जनता पर भी लागू किया। उसने बलबन के गुप्तचर विभाग को पुन: चालू किया जो उसे सभी षड्यंत्रों या साजिश की सूचना देते थे। उसके सामने कई चुनोतियां आयी जैसे:-

  • जलाली, अमीरों तथा जलालुद्दीन परिवार के अन्य सदस्यों से अपने आप को सुरक्षित रखना।
  • उत्तर-पश्चिम से मंगोल आक्रमण का भय।
  • रणथभौर और चितोढ़ जैसे शक्तिशाली राज्यों का राजपुताना में उदय।
  • सल्तनत के प्रशासनिक एवं आर्थिक आधारों को मजबूत करना तथा उलेमाओं तथा अमीरों के म्ह्त्वकांशाओ पर लगाम लगाना।
  • साम्राज्य विस्तार के साथ – साथ प्रशासनिक सुधार भी अनिवार्य थे।

अलाउद्दीन खिलजी ने इन चुनोतियो का सामना करने के लिए निम्न कार्य किये:-

  • अमीरों को एक – दुसरे से मिलने पर पाबन्दी लगा दी गई। आपस में वैवाहिक संबंध स्थापित करने के लिए भी उन्हें सुल्तान की अनुमति लेनी पड़ती थी।
  • सभी पुण्यार्थ जमीने अर्थात इनाम या वक्फ में दी गई जमीने जब्त कर ली गई।
  • मदिरापान पर भी पाबंदी लगा दी गई और इन आदेशो का उल्लघन करने वालो को कठोर दंड दिए गए।

शासक बनने के साथ अलाउद्दीन ने सर्वप्रथम अपनी स्थिति सुदृण करने के उपाय किये। अलाउद्दीन ने पुराने सामंतो को हटाकर अपने समर्थको को बड़े पद प्रदान किये तथा साथ ही साथ बड़े पदों पर तुर्कों के एकाधिकार को समाप्त करके भारतीय मुसलमानों को प्रभावशाली प्रशासनिक पद प्रदान किए। अलाउद्दीन ने हिन्दू राजाओ की भी सेवा प्राप्त की। अत: सत्ता पर तुर्कों का एकाधिकार उसने पूर्णत: समाप्त कर दिया।

अलाउद्दीन खिलजी द्वारा साम्राज्य विस्तार


अलाउद्दीन खिलजी एक महत्वकांशी शासक था। वह भी पूर्व शासको (सिकंदर, अशोक, समुद्र, गुप्त आदि) की भाँती विश्व विजय तथा एक नए धर्म की स्थापना भी करना चाहता था। उसने ‘सिकंदरुस्सानी’ की पदवी भी धारण की थी। मुख्य रूप से अलाउद्दीन खिलजी का साम्राज्य विस्तार संबंधी अभियान निम्न क्षेत्रों पर ही केन्द्रित रहा:

  • पश्चिम भारत (गुजरात)
  • मध्य भारत (मालवा और राजपूताना)
  • दक्षिण भारत
  • उत्तर भारत

उत्तर और दक्षिण भारत में उसने अलग – अलग नीतियां अपनाई। उत्तर भारत के राज्यों को जीतकर उसने अपने साम्राज्य में मिला लिया, जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों पर उसने अप्रत्यक्ष नीति अपनायी। क्योंकि दक्षिण भारत पर उसके अभियान का मुख्य उदेश्य धन प्राप्ति था।

अलाउद्दीन का प्रथम अभियान गुजरात पर हुआ। यहाँ बघेल राजपूतो का शासन था। यहाँ का शासक कर्णदेव था। गुजरात अभियान के लिए नुसरत खां एवं खां को नियुक्त किया। वहां का रजा कर्ण देव, तुर्क आक्रमण का सामना करने में असमर्थ हुआ तथा वह देवगिरी (सीमावर्ती राज्य) भाग गया। अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने उसके राज्य पर अधिकार कर लिया। सूरत, कैम्बे और सोमनाथ के नगरो से अलाउद्दीन की सेना ने अत्यधिक धन प्राप्त किया। कैम्बे नगर में ही मलिक काफूर पकड़ा गया। जो बाद में अलाउद्दीन के दक्षिणी अभियानों का सेनानायक या प्रमुख बना।

मुल्तान और गुजरात पर अधिकार के पश्चात अलाउद्दीन ने राजपूत राज्यों को घेर लिया। इससे पूर्व राजपूताना के क्षेत्र ऐबक और इल्तुमिश द्वारा पहले जीते जा चुके थे किन्तु बाद में इन क्षेत्रों पर तुर्क सत्ता कमजोर हो गई थी। इसलिए अलाउद्दीन खिलजी का इन राज्यों पर अधिकार राजनीतिक महत्वकांशा की पूर्ति के लिए जरुरी था। अलाउद्दीन ने सबसे पहले जैसलमेर पर आक्रमण किया। यह आक्रमण गुजरात से लौटते समय किया गया क्योंकि इन्होने अलाउद्दीन की सेना को रोका था। गुजरात अभियान के बाद वापस लौटती हुई सेना में विद्रोह हो गया और कुछ सैनिक राजकोष से धन लेकर भाग गए।


राजस्थान के रणथभौर के शासक हम्मीर देव से अलाउद्दीन ने मांग की वह इन भागो हुए सैनिको को उसके हवाले कर दे। किन्तु हम्मीर देव ने इस मांग को अस्वीकार किया। अलाउद्दीन खिलजी ने 1300 ई० में स्वयं रणथभौर दुर्ग का घेरा डाल दिया। इसी समय कई विद्रोह भी हुए किन्तु अलाउद्दीन विचलित नहीं हुआ और 1301 ई० में रणथभौर पर उसका अधिकार हो गया।

अलाउद्दीन का सबसे महत्वपूर्ण अभियान चितोढ़ की विजय (1302-03 ई०) थी। इस अभियान में आमिर खुसरो ने भी भाग लिया तथा उन्होंने इस आक्रमण का विस्तृत वर्णन किया है। इस समय चितोढ़ का शासक राणा रतन सिंह था। वस्तुत: अलाउद्दीन की चितोढ़ राज्य से कोई शत्रुता नहीं थी। चित्तोड़ अभियान का उद्देश्य चित्तोड़ की रानी पद्मिनी को प्राप्त करना था जिसकी सुन्दरता की चर्चा सुनी थी। किन्तु यह विवरण कल्पना पर आधारित ने चित्तोड़ की घेरेबंदी नहीं तोड़ी। अंतत: चित्तोड़ के राजा रतन सिंह ने आत्म समर्पण कर दिया। अलाउद्दीन ने चित्तोड़ का शासक अपने बेटे खिज्र खां को नियुक्त किया।

पश्चिमी अभियान के बाद अलाउद्दीन का ध्यान मध्य भारत के राजपूत राज्यों की और गया। अलाउद्दीन ने 1305 ई० में मालवा की विजय के लिए एनुल मुल्क मुल्तानी को भेजा। इसने मालवा पर अधिकार कर लिया इसके बाद मांडू के दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया। अलाउद्दीन ने इन दोनों क्षेत्र का शासन ऐनुल मुल्क मुल्तानी को दिया।

इसके पश्चात् उज्जैन चदेरी आदि राज्य भी विजित किये गये। इसके पश्चात् सिवानो पर आक्रमण (1308) हुआ। यहाँ का शासक शीतल देव मारा गया तथा कमालुदीन को सिवाना का शासक नियुक्त किया गया। इसके पश्चात् जालोर पर विजय प्राप्त कि गयी। यहाँ का शासक कहर्देव था। किन्तु इस क्षेत्र पर विजय 1311 ई० में हुई। इसी समय में अलाउद्दीन ने कई अन्य छोटे राज्यों पर विजय प्राप्त की जैसे – बूंदी, टोंक, मंडोर, और मारवाड़ आदि। दिल्ली सल्तनत का साम्राज्य विस्तार अब उत्तरी भारत के मुख्य भाग मध्य भारत और पश्चिमी भारत (गुजरात) तक विस्तृत हो गया। कश्मीर, बंगाल और पूर्वी भारत के क्षेत्रों को चोधकर शेष भारत पर अलाउद्दीन का नियंत्रण स्थापित हो गया।

दक्षिण भारत का अभियान एवं अप्रत्यक्ष नियंत्रण का प्रयास


अलाउद्दीन खिलजी के दक्षिणी अभियान को उदेश्य वस्तुत: धन की प्राप्ति थी। साम्राज्यवादी नीति के सबसे बड़ी उपलब्धि दक्षिणी राज्यों की विजय थी। अलाउद्दीन दिल्ली सल्तनत का प्रथम शासक था, जिसने दक्षिण भारतीय अभियान किया और इसमें सफलता भी प्राप्त की। दक्षिणी अभियान की विस्तृत जानकारी बरनी कृत तारीखे फिरोजशाह तथा अमीर खुसरो की रचना खजाइनुल फुतूह एवं इसामी केफुतुहुससलातीन से मिली है। इन अभियानों का संचालन मलिक काफूर द्वारा हुआ है।

दक्षिण भारतीय अभियान के समय दक्षिण में कई राज्य थे किन्तु उनमे चार प्रमुख थे:-

  • देवगिरि – यादव वंश (विध्य पर्वतमाला के दक्षिण में)
  • वारंगल – काकतीय वंश
  • द्वार समुद्र – होयसल वंश
  • माबर या मुद्रा – पांड्य वंश

इन राज्यों के परस्पर सम्बन्ध कटुतापूर्ण थे और वे बराबर आपस में संघर्षरत रहते थे। एक दुसरे केशक्ति को नियंत्रित करने के लिए वे अपने पडोसी तुर्क सेनाओ की सहायता लेते थे। दक्षिण भारत के स्थिति उत्तर भारत से भिन्न थी, यही कारण है कि दक्षिण के राज्य धनी होते हुए भी अपनी रक्षा करने में असमर्थ थे। इसी आपसी संघर्ष के कारण अलाउद्दीन दक्षिण राज्यों पर विजय प्राप्त कर सका।

दक्कन के सैनिक अभियान का नेतृत्व मलिक काफूर को दिया गया और इस अभियान में मदद करने के लिए आईन उल मुल्क मुल्तानी तथा अल्प खां को निर्देश भेजे गये। मलिक काफूर का पहला अभियान 1307-08 में देवगिरी के विरुद्ध हुआ। सत्ता पर अधिकार करने के पूर्व ही वहां के शासक रामचंद्र देव ने आत्मसमर्पण कर दिया और वार्षिक नजराना देने को तैयार हुआ तथा इसने अपनी पुत्री को विवाह अलाउद्दीन के साथ किया।

1309-10 ई० के बीच मलिक काफूर ने वारंगल पर आक्रमण किया। युद्ध का शीघ्र हे अंत हो गया क्योंकि रॉय रुद्रदेव आत्मसमर्पण करने को तैयार हो गया। मलिक काफूर ने पुन: द्वार समुद्र के किले को घेरा। द्वार समुद्र के शासक ने भी अपार धन और वार्षिक नजराना देने का वचन दिया।

तदुपरांत वह माबार के और अग्रसर हुआ और पांड्यो की राजधानी मदुरा पहुँच गया। लेकिन वहां का शासक सुन्दर पहले ही भाग गया। मलिक काफूर ने मदुरा राजकोष पर अधिकार कर लिया।

मंगोलों से संघर्ष


सर्वप्रथम 1302 में तारगी ने दिल्ली पर घेरा डाला। यह एकमात्र अवसर था जब मंगोल सेनाए राजधानी तक पहुँच आयी थी। 1305-06 में अलिबेग, तरतक और तारगी ने दिल्ली पर आक्रमण किया किन्तु असफल रहे। 1307 ई० में कुबक और इक़बालबंदा ने आक्रमण किया किन्तु असफल रहे।

सैनिक सुधार


अलाउदीन ने एक स्थायी सेना का गठन किया। सैनिको को भू-दान की जगह नगद वेतन देने की प्रथा प्रारम्भ की। इसने दाग एवं हुलिया कि प्रथा आरम्भ की। इसके अंतर्गत राज्य द्वारा सेना के घोड़ो पर मोहर का निशान लगा दिया जाता था। ताकि सैनिको द्वारा उन्हें बदल कर कमजोर घोडा न लाया जा सके। इसके साथ ही साथ सैनिको का हुलिया लिख लिया जाता था। इस प्रकार अलाउदीन खिलजी ने सेना की कार्य कुशलता में विशेष सुधार किया जिससे वह सम्पूर्ण भारत पर अपना साम्राज्य विस्तार कर सका।


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