आईएएस प्रीलिम्स: पर्यावरण, पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और जलवायु परिवर्तन की तैयारी कैसे करें।

पर्यावरण, पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और जलवायु परिवर्तन की तैयारी के लिये रणनीति।

Environment & Ecology

यूपीएससी ने वर्ष 2011 में सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के सामान्य अध्ययन (पेपर - 1) में एक नया विषय प्रस्तुत किया जिसे हम पर्यावरण पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और जलवायु परिवर्तन के नाम से जानते हैं। यद्यपि यूपीएससी ने पाठ्यक्रम में यह कथन दिया है कि पाठ्यक्रम के इस विषय में किसी प्रकार की विशेषज्ञता की आवश्यकता नहीं है, लेकिन पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी क्षेत्र में होने वाले निरंतर विकास एव परिवर्तनों के दृष्टिकोण से इसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

यदि हम देखें तो पर्यावरण और पारिस्थितिकीय खंडों से प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में प्रश्न पूछे गये हैं। इस खंड के महत्व में काफी वृद्धि हुई है, जब से भारतीय वन सेवा और सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा को एक साथ जोड़ दिया गया है। पर्यावरण, पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और जलवायु परिवर्तन का भाग अधिकांश सिविल सेवा उम्मीदवारों के लिए एक परेशानी का कारण होता है क्योंकि इसके अध्ययन के लिये कोई ठोस व उपयुक्त अध्ययन सामग्री उपलब्ध नहीं है इसलिये अभ्यर्थियों को स्वयं ही इस विषय की तैयारी करनी है। इस खंड में पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रकृति मध्यम से कठिन होती है।

इस खंड की गंभीरता इस तथ्य से भी तय की जा सकती है कि यह जनरल स्टडीज (पेपर 1) के लगभग 25-30 प्रतिशत अंको के प्रश्न इसी विषय से पूछे जाते हैं। यदि हम पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरण, पारिस्थितिकी, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन खंड के महत्व पर एक नजर डालें तो हमें इस खंड के ट्रेंड और प्रवृत्ति के बारे में जान सकते हैं।


(गत वर्षों के प्रश्न पत्रों का ट्रेंड एनालिसिस)

UPSC Environment Ecology Trend Analysis


यूपीएससी द्वारा इस खंड के लिए जो पाठ्यक्रम निर्देशित किया है बहुत संक्षिप्त रूप में दिया गया है, लेकिन यह भी सलाह दी जाती है कि उम्मीदवार इस विषय के महत्वपूर्ण उप-विषयों को जानने का प्रयास करे जहां से प्रश्नों के आने की उम्मीद की जा सकती है।

उम्मीदवारों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने विषय से जुड़े मूल सिद्धांतों को याद रखें और साथ ही इससे जुड़े वर्तमान समाचारों और घटनाओं पर नजर बनाए रहें। क्योंकि स्थिर (Static), गतिशील (Dynamic)और समकालीन (Contemporary) सहित सभी प्रकार के प्रश्नों को इस खंड से पूछा गया है। इस खंड के लिए इंटरनेट का उपयोग किया जा सकता है क्योंकि इस खंड के तहत विभिन्न विषयों और उप-विषयों की जानकारी एक पुस्तक में नहीं मिल सकती।

पर्यावरण और पारिस्थितिकीय की तैयारी करने के स्रोत

  • एनसीईआरटी भूगोल - कक्षा छठी से दसवीं
  • एनसीईआरटी विज्ञान - कक्षा सातवीं से दसवीं तक
  • एनसीईआरटी इकोनॉमी - कक्षा ग्यारहवीं
  • एनसीईआरटी जीवविज्ञान - कक्षा बारहवीं
  • एनसीईआरटी रसायन विज्ञान - कक्षा बारहवीं
  • अख़बारों से छपे पर्यावरण विभाग से संबंधित समाचार और संपादकीय।
  • पर्यावरण मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट से नियमित अपडेट
  • इंडिया ईयर बुक (India Year Book)
  • भारत का आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey of India)
  • 12वीं पंचवर्षीय योजना (वॉल्यूम - 1) से अध्याय संख्या 4, 5 और 7 का अध्ययन।
  • विज्ञान रिपोर्टर (Science Reporter) और डाउन टू अर्थ (Down To Earth) इत्यादि।
  • पी.डी. शर्मा द्वारा लिखी गये पारिस्थितिकी और पर्यावरण की पुस्तक (Ecology and Environment by P.D. Sharma)।

पर्यावरण और पारिस्थितिकीय की तैयारी रणनीति

सामान्य विज्ञान और एनसीईआरटी पुस्तकों का उपयोग करके अपनी मूलभूत जानकारी का निर्माण करना शुरू करें। इन किताबों से पढ़ते समय केवल विषय से जुड़े अध्यायों का होना महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमें पाठ्यक्रम में यूपीएससी द्वारा निर्धारित पर्यावरण, पर्यावरण, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन के लिए अध्यायों को चुनना है। एनसीईआरटी पुस्तकों से एक अच्छी नींव बनाने में मदद मिलती है, फिर भी अभ्यर्थियों को कई नियमों और अवधारणाओं की स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाती। इसे दूर करने के लिये ऊपर बताई गयी पुस्तक (पी.डी. शर्मा)  आपके लिये उपयोगी होगी क्योंकि इस पुस्तक में अवधारणाओं को समझना बहुत आसान है और सब स्पष्ट रूप से लिखा गया है।

ऊपर सूचीबद्ध स्रोतों से पढ़ते समय, पर्यावरण से संबंधित विभिन्न शर्तों, संगठनों, प्रकाशन रिपोर्ट, मुद्दों, संधियों आदि विशेष विषय से संबंधित जानकारी एकत्र करने की सलाह दी जाती है। उम्मीदवारों को पिछले वर्ष के पेपर से सवालों की प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए और तदनुसार तैयारी करनी चाहिए। माडल प्रश्नों का अभ्यास आपकी तैयारी को बढ़त देते हैं और अध्ययन और मूल्यांकन के बीच एक अच्छा संतुलन बनाते हैं जो तैयारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। देश और विदेशों में होने वाली घटनाओं को नजरअंदाज न करें। विभिन्न घटनाओं को स्थिर स्रोतों से जोड़ कर अध्ययन करने से विषय में एक बेहतर परिप्रेक्ष्य और ज्ञान प्राप्त करने में मदद मिलती है।


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